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Bihar Politics Crisis: नड्डा का बयान, आरसीपी सिंह या उद्धव से सबक? जानें नीतीश के पाला बदलने के पांच बड़े कारण

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Tue, 09 Aug 2022 04:54 PM IST
सार

यह जानना अहम है कि आखिर नीतीश कुमार को यह फैसला लेने पर मजबूर क्यों होना पड़ा है? ऐसी क्या वजहें थीं कि पांच साल पहले भाजपा के साथ आने का एलान करने वाले नीतीश कुमार ने फिर से गठबंधन तोड़ने का एलान कर दिया? आइये जानते हैं वे पांच कारण...

बिहार में फिर चाचा-भतीजा सरकार?
बिहार में फिर चाचा-भतीजा सरकार? - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार

बिहार में विधानसभा चुनाव के महज ढाई साल बाद ही भाजपा और जदयू गठबंधन में दरार आ गई। सीएम नीतीश कुमार ने एक बार फिर एनडीए में सम्मान न मिलने की बात कर कर गठबंधन से बाहर निकलने का एलान किया। पांच साल में यह दूसरी बार है, जब नीतीश कुमार ने पाला बदलने का एलान किया है। 


इस बीच यह जानना अहम है कि आखिर नीतीश कुमार को यह फैसला लेने पर मजबूर क्यों होना पड़ा है? ऐसी क्या वजहें थीं कि पांच साल पहले भाजपा के साथ आने का एलान करने वाले नीतीश कुमार ने फिर से गठबंधन तोड़ने का एलान कर दिया? इसके अलावा गठबंधन के टूटने के जदयू की तरफ से भाजपा को क्यों जिम्मेदार ठहराया जा रहा है? आइये जानते हैं वे पांच कारण...

बिहार के डिप्टी सीएम रेणु देवी और तारकिशोर प्रसाद
बिहार के डिप्टी सीएम रेणु देवी और तारकिशोर प्रसाद - फोटो : पीटीआई
1. फैसले लेने की स्वतंत्रता नहीं मिलना
भाजपा और जदयू की ओर से 2020 का विधानसभा चुनाव साथ लड़ा गया। जहां भाजपा ने इस चुनाव में 75 सीटें हासिल कीं, तो वहीं जदयू महज 43 सीट पर ही सीमित हो गई। यानी भाजपा इस बार सरकार में बड़े भाई की भूमिका में थी। भाजपा ने अपनी इस स्थिति का फायदा भी उठाया। नीतीश कुमार सरकार में मुख्यमंत्री जरूर रहे, लेकिन भाजपा ने अपना नियंत्रण बरकरार रखने के लिए दो डिप्टी सीएम- तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी भी उनके साथ रखे। इससे बिहार सरकार में नीतीश कुमार के एकछत्र नेतृत्व को चुनौती देने की कोशिश की गई। 

इसके अलावा भाजपा ने नीतीश कुमार के लंबे समय तक साथी और पूर्व डिप्टी सीएम सुशील मोदी को भी बिहार की राजनीति से बाहर कर दिया। भाजपा के इन कदमों के बाद नीतीश के लिए सरकार पर पूरी तरह नियंत्रण रखना काफी मुश्किल हो रहा था। बताया जाता है कि सुशील मोदी की गैरमौजूदगी में नीतीश के लिए अपनी मर्जी से कैबिनेट मंत्रियों को चुनना भी कठिन रहा। वे भाजपा से अपनी बात नहीं मनवा पा रहे थे। नीतीश कुमार के लिए इस तरह से बिहार की राजनीति में स्वतंत्रता न मिलना जदयू नेताओं को भी अखरने लगा था और समय-समय पर वे भाजपा को लेकर कई तरह के बयान देते रहे थे। 

नीतीश कुमार-विजय सिन्हा
नीतीश कुमार-विजय सिन्हा - फोटो : सोशल मीडिया
2. विधानसभा अध्यक्ष को लेकर नाराजगी
इसी साल मार्च में भाजपा और जदयू के बीच के रिश्तों में दरार की पहली झलक देखने को मिली थी। दरअसल, विधानसभा सत्र के दौरान एक मौके पर सीएम नीतीश कुमार और विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा में नोंकझोंक हो गई थी। दरअसल, मामला बिहार के लखीसराय में 50 दिन में 9 लोगों की हत्या पर बहस को लेकर था। विधानसभा अध्यक्ष विजय सिन्हा के क्षेत्र का सवाल भाजपा विधायक ने उठाया था। इस पर सरकार को जवाब देने में काफी मुश्किलें आईं। भाजपा की ओर से उठाए गए इस मुद्दे की वजह से विपक्ष को भी सरकार के विरोध का मौका मिल गया। 

आखिरकार मामले को लेकर विधानसभा में आए दिन हो रहे हंगामे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भड़क उठे। उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से आक्रामक अंदाज में कहा कि इस तरह की बहस को अनुमति देकर भ्रम पैदा होता है। हालांकि, स्पीकर विजय सिन्हा ने भी नीतीश को जवाब देते हुए कहा कि यह मेरे इलाके का मामला है और जब भी क्षेत्र में जाता हूं तो शिकायत मिलती हैं। इस पर नीतीश और सिन्हा के बीच नाराजगी इतनी बढ़ गई कि सीएम ने उन पर संविधान उल्लंघन तक का आरोप लगा दिया। माना जाता है कि इस घटना के बाद से ही नीतीश कुमार भाजपा से विधानसभा अध्यक्ष को हटाने की मांग कर रहे थे। 

जेपी नड्डा और नीतीश कुमार
जेपी नड्डा और नीतीश कुमार - फोटो : अमर उजाला
3. नड्डा का बयान
10 दिन पहले यानी 31 जुलाई को भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के एक बयान ने भी बिहार की राजनीतिक हलचल को बढ़ा दिया था। उस दिन नड्डा बिहार में पार्टी के कई कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पहुंचे थे। यहां उन्होंने कहा था कि भविष्य में स्थानीय पार्टियों का अस्तित्व ही नहीं बचेगा। नड्डा ने कहा था, "मैं बार-बार कहता हूं कि देखो अगर ये विचारधारा नहीं होती तो हम इतनी बड़ी लड़ाई नहीं लड़ सकते थे। सब लोग (अन्य राजनीतिक दल) मिट गए, समाप्त हो गए और जो नहीं हुए वे भी हो जाएंगे। रहेगी तो केवल भाजपा ही रहेगी। भाजपा के विरोध में लड़ने वाली कोई राष्ट्रीय पार्टी बची नहीं। हमारी असली लड़ाई परिवारवाद और वंशवाद से है।"

माना जाता है कि जेपी नड्डा के इस बयान के बाद नीतीश कुमार बिहार में भाजपा के इरादों को लेकर काफी सतर्क हो गए थे। जदयू प्रमुख को यह लग गया था कि 2020 के बाद 2024 के चुनाव में भाजपा और मजबूती से चुनाव लड़ेगी और जदयू के बगैर ही सरकार बनाने का दावा पेश कर देगी। नीतीश की इन आशंकाओं की पुष्टि उमेश कुशवाहा समेत जदयू के कुछ और नेताओं के बयानों ने भी कर दी थी। हाल ही में महाराष्ट्र में शिवसेना में टूट के प्रकरण ने भी नीतीश की चिंता को बढ़ा दिया था।

बिहार में महाराष्ट्र की तरह सरकार बदलने की सुगबुगाहट।
बिहार में महाराष्ट्र की तरह सरकार बदलने की सुगबुगाहट। - फोटो : Amar Ujala
4. शिंदे, सिंधिया, पायलट प्रकरण से सबक 
नीतीश के लिए जदयू को एनडीए गठबंधन से अलग करने का फैसला कठिन साबित होने वाला था। हालांकि, महाराष्ट्र में पिछले दो महीनों में हुए पूरे घटनाक्रम ने नीतीश को और ज्यादा सतर्क करने का काम किया है। दरअसल, नीतीश को शक था कि भाजपा महाराष्ट्र की तरह ही बिहार में भी खेल करने की कोशिश करेगी। नीतीश को आशंका थी कि महाराष्ट्र में भाजपा ने सरकार बनाने के लिए शिवसेना में ही बगावत पैदा करा दी और पार्टी के दो टुकड़े कर मजबूत धड़े का साथ दिया, उसी तरह भाजपा जदयू खेमे में भी दरार डाल सकती है। 

इसके अलावा भाजपा की तरफ से बीते कुछ वर्षो में मध्य प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान में भी सरकारों को बदलने के आरोप लगे हैं। जहां मध्य प्रदेश में पार्टी ने कांग्रेस नेता सिंधिया को तोड़कर सरकार बनाई तो वहीं कर्नाटक में कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन के टूटने के बाद पार्टी ने सरकार बनाने के लिए हर तिकड़म भिड़ाई। भाजपा पर कुछ इसी तरह की कोशिश राजस्थान में करने का आरोप लगा, जब सचिन पायलट ने सीएम अशोक गहलोत के खिलाफ बगावत कर दी। हालांकि, पायलट के डिप्टी सीएम पद से हटाए जाने के बाद राजस्थान में सरकार बदलना काफी मुश्किल हो गया। 

आरसीपी सिंह
आरसीपी सिंह - फोटो : अमर उजाला
5. आरसीपी सिंह:
हालिया घटनाक्रमों और भाजपा की मंशाओं को लेकर नीतीश के शक पर मुहर लगाई आरसीपी सिंह और भाजपा की बढ़ती करीबियों ने। दरअसल, जब जदयू ने केंद्र सरकार में कैबिनेट में जगह लेने से इनकार कर दिया था, तब भी नीतीश के करीबी रहे आरसीपी सिंह इस्पात मंत्री बने। माना जाता है कि केंद्र में रहते हुए आरसीपी ने भाजपा से करीबी काफी बढ़ाई। इसके बाद ही नीतीश को उनसे खतरा महसूस होने लगा था। दो महीने पहले नीतीश ने राज्यसभा चुनाव के लिए आरसीपी सिंह का नाम न देकर इस खतरे को टालने की ओर इशारा कर दिया। रिपोर्ट्स की मानें तो नीतीश कुमार के हाथ कुछ ऐसे ऑडियो टेप भी लगे, जिनमें भाजपा और आरसीपी सिंह के बीच जदयू में टूट कराने से जुड़ी बातचीत चल रही थी। कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार जब एनडीए से अलग होने को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेंगे तो इन टेप्स का जिक्र करेंगे।

हालांकि, इसके बावजूद नीतीश कुमार को आरसीपी सिंह पर पार्टी में टूट पैदा करने का शक था। इन खतरों से निपटने की तैयारी भी नीतीश ने इस साल की शुरुआत में ही कर दी थी, जब जदयू ने आरसीपी के करीबी चार नेताओं को पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया था। नीतीश ने अपनी पार्टी में टूट की बची कोशिशों को कुचलने के लिए आखिरकार इस महीने आरसीपी सिंह को भी भ्रष्टाचार से जुड़े आरोपों पर कारण बताओ नोटिस जारी करवा दिया। जदयू की तरफ से इस तरह साख गिराने की कोशिशों के बाद आखिरकार आरसीपी ने खुद पार्टी से इस्तीफा दे दिया। इस तरह नीतीश ने पार्टी में टूट पैदा करने की कोशिशों पर भी लगाम लगाने की पूरी कोशिश की है। 
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