ICMR: कोरोना के ओमिक्रॉन वैरिएंट के खिलाफ दूसरे टीकों से ज्यादा कारगर हो सकती है कोवाक्सिन, एक्सपर्ट्स ने बताया यह कारण

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Fri, 03 Dec 2021 11:53 AM IST

सार

कोवाक्सिन को इससे पहले कोरोना के अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ भी कारगर करार दिया जा चुका है। 
भारत की कोवाक्सिन।
भारत की कोवाक्सिन। - फोटो : सोशल मीडिया
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दुनियाभर में कोरोनावायरस के नए स्वरूप ओमिक्रॉन का खतरा बढ़ता जा रहा है। इस बीच कई वैक्सीन कंपनियों ने इस वैरिएंट के खिलाफ अपने टीके की प्रभावशीलता को लेकर शक जताया है। हालांकि, भारत में बनी कोरोना वैक्सीन- कोवाक्सिन को लेकर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) के एक्सपर्ट्स ने भरोसा जताया है। अधिकारियों का कहना है कि भारत बायोटेक की कोवाक्सिन कोविड के इस परिष्कृत रूप से निपटने में ज्यादा प्रभावी हो सकती है। 
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एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर कहा, "कोवाक्सिन के डोज बाकी मौजूदा वैक्सीन के मुकाबले ज्यादा प्रभावी हो सकते हैं। क्योंकि यह इनएक्टिवेटेड वायरस की तकनीक पर बनाया गया टीका है, जो कि पूरे वायरस को ही निष्क्रिय कर देता है और यह नए वैरिएंट पर भी प्रभावी पाया जा सकता है।"


कोवाक्सिन को इससे पहले कोरोना के अल्फा, बीटा, गामा और डेल्टा वैरिएंट के खिलाफ भी कारगर करार दिया जा चुका है। अधिकारी ने कहा, "हम मान सकते हैं कि कोवाक्सिन बाकी वैरिएंट्स के खिलाफ भी उतनी ही कारगर होगी।" हालांकि, अधिकारी ने साफ किया कि वैक्सीन लगवा चुके लोगों को बिल्कुल एहतियात बरत कर रहना चाहिए। हम लोग इस वैरिएंट के खिलाफ टीके की प्रभावशीलता परखने के लिए नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी में टेस्ट्स करेंगे। 



क्या है कोवाक्सिन और कैसे होता है इसका निर्माण?
कोरोनावायरस वैक्सीन का निर्माण भारत बायोटेक इंटरनेशनल लिमिटेड (बीबीआईएल) ने पुणे स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (एनआईवी) के साथ मिलकर किया है। एनआईवी ने संक्रमित लेकिन बिना लक्षण वाले व्यक्ति से ली गई कोरोनावायरस की एक स्ट्रेन को अलग कर लिया और इसे भारत बायोटेक को मई 2020 को सौंप दिया था। इसके बाद कंपनी ने इस स्ट्रेन पर रिसर्च करने के बाद इनएक्टिवेटेड यानी असक्रिय वायरस की तकनीक पर वैक्सीन बनाने की कोशिशें शुरू कीं। 

असक्रिय वायरस की तकनीक से वैक्सीन बनाने का सीधा मतलब यह है कि ऐसे टीकों में मरा हुआ या सुषुप्तावस्था में रखा गया वायरस इस्तेमाल होता है। भारत बायोटेक ने ऐसे टीकों को हैदराबाद स्थित हाई-कंटेनमेंट फैसिलिटी में बनाना शुरू किया। एक बार जब यह वैक्सीन इंसानी शरीर में प्रवेश करती है, तो इसमें संक्रमित करने या खुद को कॉपी करने की क्षमता नहीं होती, क्योंकि यह पहले से ही मृत वायरस होता है। यह इंसानी प्रतिरोधक क्षमता के लिए भी मरा हुआ वायरस होता है, यानी इसके प्रवेश से शरीर को कोई नुकसान नहीं होता। लेकिन इसके बावजूद इम्यून सिस्टम (प्रतिरक्षा तंत्र) इस वायरस की पहचान कर इसके खिलाफ एंटीबॉडी तैयार कर लेता है। 

इस डेड वायरस वैक्सीन को इंसानी शरीर में लगाए जाने का असर यह होता है कि अगली बार जब भी सक्रिय कोरोनावायरस इंसानी शरीर में घुसने की कोशिश करता है, तो वैक्सीन पा चुके लोगों का इम्यून सिस्टम पहले से ही तैयार होता है, क्योंकि वह पहले ही वायरस की पहचान कर इसके खिलाफ एंटीबॉडी पैदा कर चुका है। यह एंटीबॉडी कोरोनावायरस के स्पाइक प्रोटीन पर हमला करती हैं और लोगों को कोरोनावायरस संक्रमित होने से बचाती हैं। 
 

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