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बीजापुर नक्सली हमला: सवालों के घेरे में CRPF के टॉप अफसर, ऑपरेशन को 'कमांड सेंटर' से कर रहे थे मॉनिटर

जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 07 Apr 2021 04:05 PM IST

सार

सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन की खामियों को लेकर कोई उच्च स्तरीय जांच नहीं बिठाई गई है। सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस अपने स्तर पर उन कमियों का पता लगा रही है, जिसके चलते सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है...
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बीजापुर
बीजापुर - फोटो : ANI (File)

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विस्तार

बीजापुर के नक्सली हमले की निगरानी करने के लिए स्थानीय स्तर पर एक 'कमांड सेंटर' तैयार किया गया था। वहां सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस के टॉप अफसर मौजूद थे। सीआरपीएफ डीजी कुलदीप सिंह भी इस ऑपरेशन पर नजर रख रहे थे। अब ये अफसर सवालों के घेरे में आ गए हैं। निगरानी टीम में सीआरपीएफ के पूर्व डीजी और केंद्रीय गृह मंत्रालय में सीनियर सिक्योरिटी एडवाइजर के. विजय कुमार, नॉर्थ जोन के स्पेशल डीजी जुल्फिकार हसन और आईजी 'ऑपरेशन' नलिन प्रभात शामिल थे।
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सूत्रों का कहना है कि ऑपरेशन की खामियों को लेकर कोई उच्च स्तरीय जांच नहीं बिठाई गई है। सीआरपीएफ और छत्तीसगढ़ पुलिस अपने स्तर पर उन कमियों का पता लगा रही है, जिसके चलते सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। सीआरपीएफ के पूर्व आईजी वीपीएस पवार का कहना है, ऐसे गंभीर मामले की उच्च स्तरीय जांच होनी चाहिए।


सूत्रों के मुताबिक, इस ऑपरेशन के लिए कई माह से तैयारी चल रही थी। खुद के. विजय कुमार रायपुर में मौजूद थे। एक कमांड सेंटर वहां भी तैयार किया गया था। उसमें कुमार के साथ स्पेशल डीजी जुल्फिकार हसन और आईजी 'ऑपरेशन' नलिन प्रभात मौजूद थे। इसके अलावा छत्तीसगढ़ पुलिस के आला अधिकारी भी कमांड सेंटर में उपस्थित रहे। पूर्व आईजी पवार कहते हैं, जब इतने बड़े अधिकारी ऑपरेशन को मॉनिटर कर रहे हैं तो वहां भारी चूक कैसे हो गई। आईजी 'ऑपरेशन' नलिन प्रभात को तो उस इलाके का अच्छा खासा अनुभव है। साल 2010 में जब दंतेवाड़ा में एक बड़े नक्सली हमले के दौरान सीआरपीएफ के 76 जवान मारे गए थे, तो वे वहीं पर डीआईजी थे।

सरकार को यह देखना चाहिए कि नक्सल प्रभावित इलाकों में जो बड़े ऑपरेशन किए जाते हैं, उनमें एक या दो फोर्स को ही शामिल किया जाए। अगर बीजापुर में केवल सीआरपीएफ की कोबरा इकाई इस ऑपरेशन को लीड करती, तो नतीजा कुछ और ही रहता। इसमें कोई शक नहीं है कि ऑपरेशन से जुड़ी सूचनाएं लंबे समय से लीक हो रही हैं। आईजी नलिन प्रभात को जंगल में अंदर तक जवानों के साथ जाना चाहिए था।

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल और भाजपा के राज्यसभा सांसद डीपी वत्स के अनुसार, जब कई एजेंसियां किसी ऑपरेशन में शामिल होती हैं तो वहां अहम सूचनाओं के बाहर आने की संभावना बनी रहती है। सीआरपीएफ की कोबरा इकाई, राज्य प्रशासन, डीआरजी और पुलिस कई संगठन ऑपरेशन से जुड़े रहते हैं। छत्तीसगढ़ में एएफएसपीए भी लागू नहीं है। ऐसी स्थिति में नक्सल ऑपरेशन के दौरान खुफिया सूचनाओं को लेकर बहुत सावधानी बरतनी पड़ती है।

दंतेवाड़ा में रहे पूर्व आईजी एसएस संधू के मुताबिक, कमांड सेंटर का मतलब क्या है। वहां बैठे अधिकारी अपने जवानों को नहीं बचा सके। इसका मतलब साफ है कि उन्हें उस इलाके के बारे में पूरी जानकारी नहीं है। सरकार को इस मामले की उच्च स्तरीय जांच करानी चाहिए। यह तो पता लगे कि कमांड सेंटर में बैठे किस अफसर को नक्सल इलाके का कितना अनुभव है और उन्हें यहां की पोस्टिंग किस आधार पर दी गई है।

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