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 24 साल बाद न्याय तो मिला पर इसरो से मदद नहीं मिलना मेरी सबसे बड़ी शिकायत: नारायणन

एजेंसी, नई दिल्ली Updated Sat, 15 Sep 2018 02:47 AM IST
s nambi narayanan
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देर से ही सही पर न्याय की हमेशा जीत होती है। यह कहावत इसरो के पूर्व वैज्ञानिक एस नंबी नारायण पर सटीक बैठती है। इसरो जासूसी केस में फंसे नारायणन को लंबी लड़ाई के बाद 24 साल बाद न्याय मिल गया। सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें बेदाग साबित कर दिया। 1994 में इसरो के स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की तकनीक पाकिस्तान और दूसरे देशों को बेचने के झूठे आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया था। 
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साजिश, आरोप, गिरफ्तारी और फिर कोर्ट की तारीखों के बीच नारायणन को जब सबसे ज्यादा जरूरत थी, तब इसरो के चेयरमैन कृष्मास्वामी कस्तूरीरंगन ने यह करते हुए मदद देने से इंकार कर दिया कि इसरो कानूनी मामलों में दखल नहीं देगा। बाद में नारायणन ने इसका जिक्र करते हुए कहा था कि यही उनकी सबसे बड़ी शिकायत है।

कब क्या हुआ...

-अक्टूबर 1994: पहली गिरफ्तारी। मालदीव की महिला मरियम राशिदा को तिरुवनंतपुरम से इसरो के स्वदेशी क्रायोजनिक इंजन की ड्राइंग की खुफिया जानकारी पाकिस्तान को बेचने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

-नवंबर 1994: नारायणन को इसरो के वैज्ञानिक डी शशिकुमारन और उपनिदेशक के चंद्रशेखर के साथ तिरुवनंतपुरम में गिरफ्तार किया गया। रूसी स्पेस एजेंसी के एक भारतीय प्रतिनिधि एसके शर्मा, एक मजदूर  कॉन्ट्रैक्टर और राशिदा की मालदीव की दोस्त फौजिया हसन को भी गिरफ्तार किया गया था। 

-दिसंबर 1994: मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने जांच में आईबी और केरल पुलिस के आरोप सही नहीं पाए।
-जनवरी 1995: इसरो के दो वैज्ञानिक और कारोबारी को बेल पर रिहा कर दिया गया। 
-अप्रैल 1996: सीबीआई ने मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में दायर एक रिपोर्ट में बताया कि मामला फर्जी है। 
-मई 1996: अदालत ने सीबीआई की रिपोर्ट स्वीकार कर ली। केस में गिरफ्तार सभी आरोपियों को रिहा कर दिया। 
-जून 1996: केरल की नई सीपीएम सरकार ने मामले की फिर से जांच का आदेश दिया।
-मई 1998: सुप्रीम कोर्ट ने केरल सरकार के फिर से जांच के आदेश को खारिज कर दिया।

-अप्रैल 1999: नारायणन ने मुआवजे के लिए याचिका दाखिल की। 2001 में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने केरल सरकार को लताड़ लगाई। लेकिन राज्य सरकार ने इस आदेश को चुनौती दी।

-मार्च 2001: मानवाधिकार आयोग ने केरल सरकार से उन्हें मुआवजे के रूप में एक करोड़ रुपये देने का आदेश दिया। लेकिन सरकार ने नहीं माना। इसी साल नारायणन सेवानिवृत्त हो गए।

-सितंबर 2012: हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को नारायणन को 10 लाख रुपये देने का आदेश दिया। 
-अप्रैल 2017: सुप्रीम कोर्ट में नारायणन की याचिका पर उन पुलिस अधिकारियों के खिलाफ सुनवाई शुरू हुई, जिन्होंने वैज्ञानिक को गलत तरीके से फंसाया था। नारायणन केरल हाई कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए, जिसमें कहा गया था कि पूर्व डीजीपी और पुलिस के दो सेवानिवृत्त अधीक्षकों केके जोशुआ और एस विजयन के खिलाफ किसी भी कार्रवाई की जरूरत नहीं है।

-मई 2018: मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के नेतृत्व में न्यायाधीश एएम खानविलकर और न्यायाधीश डीवीआई चंद्रचूड़ की तीन जजों की बेंच ने कहा कि वह नारायणन को 75 लाख रुपये मुआवजा देने के साथ उनकी प्रतिष्ठा फिर से बहाल करने के बारे में विचार कर रहे हैं।

-14 सितंबर 2018: सुप्रीम कोर्ट ने उत्पीड़न का शिकार हुए नारायणन को 50 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने इस मामले में एक न्यायिक जांच का भी आदेश दिया।

नारायणन को जेल में दी गई थीं यातनाएं

गिरफ्तारी के बाद नारायणन 50 दिनों तक जेल में रहे। उनका कहना है कि उन्हें गिरफ्तार करने वाले आईबी अधिकारी चाहते थे कि वह इसरो के अपने शीर्ष अधिकारियों के खिलाफ झूठे आरोप लगाएं। उन्होंने जब ऐसा करने से मना कर दिया तो उन्हें यातनाएं दी गईं। 

भविष्य की योजना पर काम कर रहे थे नारायणन

नारायणन 1970 के दशक में भारत में द्रव ईंधन की तकनीक पर काम कर रहे थे। उस दौरान एपीजे अब्दुल कलाम की टीम ठोस मोटर पर काम कर रही थी। नारायणन ने इसरो को बता दिया था कि किस तरह भविष्य के कार्यक्रमों में द्रव ईंधन वाले इंजन काम आने लगेंगे। उस समय वह इसरो के चेयरमैन सतीश धवन के करीबी थे। नारायणन का काम संभालने वाले यूआर राव नारायणन ने बाद में द्रव ईंधन वाले इंजन विकसित किए।

नारायण ने आत्मकथा में किया है सच का खुलासा

नारायणन ने ओंरकालुडे ब्रामनपट्टनम नाम से अपनी आत्मकथा भी लिखी है। इसमें उन्होंने सभी सच को उजागर किया है कि कैसे उन्हें एक साजिश के तहत फंसाया गया। आत्मकथा 23 अक्टूबर 2017 को प्रकाशित हुई थी। 

क्या है इसरो जासूसी कांड

इसरो जासूसी कांड 1994 में उस समय सुर्खियों में आया था, जब भारत अपनी क्रायोजनिक रॉकेट इंजन तकनीक के लिए रूस से बाचतीच कर रहा था। इसरो उस समय क्रायोजेनिक रॉकेट इंजन पर काम कर रहा था। वह उसे बनाने के भी काफी करीब था। इसी दौरान पाकिस्तान और दूसरे देशों को इसकी तकनीक बेचने के आरोप में क्रायोजनिक इंजन विभाग के प्रमुख नारायणन समेत तीन वैज्ञानिकों को गिरफ्तार कर लिया गया। बाद में आरोप खारिज हो गया। उधर, नारायणन की गिरफ्तारी से क्रायोजनिक इंजन तकनीक पर अनुसंधान का काम भी ठप हो गया। भारत के पिछड़ने का सीधा लाभ अमेरिका और फ्रांस को मिला। शक जताया गया कि इसरो जासूसी कांड का तानाबाना अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने बुना।

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