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चुनावी वर्ष में फिर निकला सोलन नगर निगम का जिन्न

ब्यूरो/अमर उजाला, सोलन Updated Thu, 16 Feb 2017 12:03 AM IST
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चुनावी वर्ष में नगर परिषद सोलन को नगर निगम बनाने का जिन्न फिर से निकला है।
चुनावी वर्ष में नगर परिषद सोलन को नगर निगम बनाने का जिन्न फिर से निकला है।
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चुनावी वर्ष में नगर परिषद सोलन को नगर निगम बनाने का जिन्न फिर से निकला है। कांग्रेस पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की सिफारिश पर मुख्यमंत्री कार्यालय से जारी पत्र में निदेशक शहरी विकास विभाग को इस प्रस्ताव संबंधित नियमानुसार आगामी कार्रवाई करने के लिए निर्देश जारी हुए हैं।
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कंडाघाट में जनसभा के दौरान सीएम वीरभद्र सिंह से कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने पत्र सौंपकर सोलन नगर परिषद को नगर निगम बनाने की मांग की थी। इसके बाद सीएम ने यह पत्र निदेशक शहरी विकास विभाग को जारी किया। पिछले वर्ष जून माह में सरकार के निर्देशानुसार नगर परिषद ने सोलन को नगर निगम बनाने का प्रस्ताव तैयार करके उपायुक्त सोलन को भेज दिया था। लेकिन आपत्तियों के चलते यह प्रस्ताव जिला प्रशासन ने रोककर रखा है।


 शहर के साथ जुड़े 12 क्षेत्रों की करीब 11 हजार की आबादी को नगर निगम में मर्ज किया जाना प्रस्तावित है। ऐसे में यदि सोलन नप को निगम का दर्जा मिलता है तो ग्रामीण क्षेत्रों की कुल 11208 की आबादी नगर निगम में शामिल होगी। 2823 हाउस होल्ड पर अतिरिक्त टैक्स का भार पड़ेगा। सबसे अधिक प्रभावित बसाल का क्षेत्र होगा। जबकि सबसे कम सिहारड़ी मौजा के लोग नगर निगम  की कवायद में शामिल किए जाएंगे।

इस आबादी पर अतिरिक्त टैक्स का बोझ पड़ेगा। कृषि बाहुल वाले क्षेत्र सरकार की कल्याणकारी स्कीमों से महरूम रहेंगे। यह प्रस्ताव आपत्तियों के चलते जिला प्रशासन के पास रुका पड़ा है। इसकी पुष्टि डीसी डॉ. राकेश कंवर ने की है। उन्होंने कहा कि प्रशासन नियमानुसार औपचारिकताएं पूरी करने के बाद ही यह प्रस्ताव निदेशालय भेजा जाएगा।

यह दिए गए हैं तर्क
नगर परिषद सोलन के पूर्व अध्यक्ष कुल राकेश पंत ने बताया कि इस संदर्भ में कांग्रेस कमेटी ने पूर्व में इस संबंध में प्रस्ताव पास किया है। कंडाघाट के दौरे के दौरान भी सीएम को इस मांग को लेकर लिखित पत्र सौंपा था। उन्होंने कहा कि करीब दो वर्ष पहले नगर परिषद के जनरल हाउस में भी सर्वसम्मति से इसके तहत प्रस्ताव पास किए गए हैं।

पिछले वर्ष भी प्रस्ताव गया है। उधर नगर परिषद द्वारा जिला प्रशासन को सौंपे फाइनल प्रारूप में तर्क दिया है कि शहर में पिछले कुछ समय में कॉलेज और विश्वविद्यालयों की संख्या में खासा इजाफा हुआ है। इसके चलते क्षेत्र एजूकेशन हब बन गया है। हिमाचल, पंजाब, हरियाणा के अलावा भारत के विभिन्न राज्यों से विद्यार्थी उच्च शिक्षा के लिए सोलन आ रहे हैं।

यह शहर में पीजी और होस्टल आदि में रह रहे हैं। इन छात्र-छात्राओं की संख्या लगभग 15 हजार से भी अधिक है। लिहाजा बेहतर सुविधाओं के लिए नगर निगम का बनना आवश्यक है। वहीं नगर परिषद के साथ सटे क्षेत्रों में भी नगरपरिषद द्वारा पानी और बिजली की सेवाएं दी जा रही हैं। उनकी संख्या करीब 11208 है। लिहाजा उन्हें भी शामिल किया जाना चाहिए।

यहां है जनसंख्या का पेच
सोलन शहर को नगर निगम का दर्जा हासिल करने के लिए 50 हजार से अधिक की आबादी की जरूरत है। लेकिन जनगणना  2010-11 के तहत शहर की आबादी 39 हजार 256 है। साथ ही वार्षिक राजस्व 2 करोड़ का होना अनिवार्य है। अब 50 हजार का आंकड़ा पूरा करने के लिए लिए शहर से सटे ग्रामीण क्षेत्रों को शहर में शामिल किया जा रहा है।

मर्ज होने वाले क्षेत्रों का संभावित आंकड़ा
कुल मौजा/ गांव    12
क्षेत्र वर्गमीटर       37 लाख 78 हजार 909 वर्ग मीटर
हाउस होल्ड    2823
जनसंख्या      11 हजार 208

विरोध के स्वर भी हैं तलख
वर्तमान में बसाल, आंजी, रबौण, सपरुण, शामती, सेरी और सलोगड़ा के कई हिस्से प्रस्तावित नगर निगम में मर्ज करने का प्लान है। इसे लेकर जिला प्रशासन में विरोध दर्ज हो चुका है। पंचायत प्रतिनिधियों ने विरोध जताते हुए तर्क दिया है कि

अगर उनका विलय नगर निगम में हुआ तो एक तरफ से केंद्रीय और राज्य सरकार की पंचायतों को दी जाने वाली तमाम कृषि सुविधाओं से वह वंचित हो जाएंगे। वहीं विभिन्न तरह के कर उन पर थोप दिए जाएंगे। लिहाजा इसे कतई सहन नहीं किया जाएगा। शामती, सेरी, सलोगड़ा, कोठो, जौणाजी, सपरूण, बसाल, कोठो और आंजी समेत कई अन्य पंचायतों के प्रतिनिधियों ने इसका विरोध किया है।

इन दो मुद्दों पर है विरोध
1) प्रतिनिधियों का कहना है कि इन क्षेत्रों के स्थानीय बाशिंदों का मुख्य व्यवसाय कृषि है। यदि यह क्षेत्र नगर निगम में विलय होते हैं तो किसानों को सरकार द्वारा मिलने वाली तमाम सुविधाओं से वंचित रहना पड़ेगा। मजबूरन किसानों को खेती छोड़नी पड़ेगी। एक तरफ किसान सरकार किसानों को मजबूत करने की बात करती है तो दूसरी ओर किसान अपने कार्य से विमुख होने लगे हैं। 

2) नगर निगम में जो पंचायतें शामिल की जानी है वहां आबादी कम और कृषि भूमि का क्षेत्रफल ज्यादा है। यदि इस क्षेत्र का नगर निगम में विलय होता है तो ग्रामीणों को अत्यधिक कर देने पड़ेंगे। यहां आमदनी के साधन कम हो जाएंगे। कर बहुत बढ़ जाएंगे। मजबूरन किसानों को अपनी जमीनें बेचनी पड़ेंगी और बेरोजगारी की जिंदगी जीने को मजबूर होना पड़ेगा।
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