गुणवत्ता नहीं, लेवलिंग-वॉल्यूम से फेल हो रहे दवाओं के सैंपल

Shimla	 Bureauशिमला ब्यूरो Updated Sat, 12 Sep 2020 11:48 PM IST
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ओमपाल सिंह
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बद्दी(सोलन)। हिमाचल की दवाइयों के भारत के दूसरे राज्यों में बन रहीं दवाइयों के उच्च गुणवत्ता के दावे हैं। यहां की दवाइयां के सैंपल दूसरे राज्यों की अपेक्षा काफी कम फेल हो रहे हैं। जो सैंपल फेल हो भी रहे हैं, उनके पीछे सूक्ष्म कारण हैं। इनमें तापमान की कमी या अधिकता, लेवलिंग और वॉल्यूम जैसे कारण हैं। निर्माण कौशल में कोई कमी नहीं है। बीते रोज जारी ड्रग अलर्ट में फेल 22 सैंपलों में से सिर्फ तीन प्रदेश के उद्योगों के सैंपल हैं जबकि देश की 60 फीसदी दवाई हिमाचल में बनती है। यही नहीं, इस बार फार्मा हब बीबीएन से कोई भी दवा का सैंपल फेल नहीं हुआ।
प्रदेश के कांगड़ा, ऊना, सिरमौर और बीबीएन में सात सौ दवा उद्योग हैं। अकेले बीबीएन में 500 उद्योग हैं। यहां बनने वाली दवाइयों की विदेशों में काफी मांग है। एशिया की 45 फीसदी दवाइयां हिमाचल के उद्योगों से निर्यात हो रही हैं। दवाइयों की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए ड्रग विभाग ने एक मॉडल बनाया है। इसमें जिस दवाई का सैंपल फेल होता है, उसके कारणों के सभी बिंदुओं की सूची तैयार कर बारीकी से काम किया जाता है। उद्योगों में निर्माण से लेकर उत्पादन और गुणवत्ता तक बड़ी गहनता से कार्य होता है।
गुणवत्ता विभाग को ड्रग विभाग समय-समय पर प्रशिक्षण देता है। वहीं, कच्चा माल सप्लाई करने वाले वेंडरों पर नजर रखी जा रही है। कुछ दवाइयां ऐसी हैं जिनकी खराब होने की अवधि दो साल है लेकिन कच्चा माल छह माह में खराब हो जाता है। इन बातों का ध्यान रखा जा रहा है। हिमाचल में दवा निर्माण और गुणवत्ता को लेकर बनाए मॉडल को पंजाब, हरियाणा और राजस्थान भी अपना रहे हैं।
राज्य की दवाओं की गुणवत्ता में कमी नहीं
जिले में तीन उद्योगों के सैंपल फेल हैं जो इतने बड़े फार्मा हब के लिहाज से काफी कम हैं। सैंपल सूक्ष्म कारणों से फेल हुए न कि निर्माण कौशल में कमी से। भारत में सबसे ज्यादा दवाई हिमाचल में बनती है जिसकी विदेशों में भी काफी मांग है। दवा नियंत्रण विभाग भविष्य में कोई भी सैंपल फेल न हो, इसके लिए कंपनी में दवा तैयार होने के समय जांचते हैं। यहां तक कि उसे बाहर की लैब में क्रॉस चेक करते हैं जिससे कंपनी से खराब दवाई बाहर निकल ही न सके।
डॉ. कमलेश नायक, सहायक दवा नियंत्रक
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