सफलता और संघर्ष से भरा 109 साल का सफर

Solan Updated Mon, 05 May 2014 05:30 AM IST
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कसौली (सोलन)। केंद्रीय अनुसंधान संस्थान आज अपने 109 साल पूरे करने जा रहा है। इस ऐतिहासिक संस्थान ने इतने लंबे सफर के दौरान जहां सफलता की ऊंचाईयों को छुआ। वहीं अपना अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष भी किया। एक ओर दुनिया में अनोखे वैक्सीन तैयार कर नाम कमाया, तो दूसरी ओर लाइसेंस सस्पेंड होने के हालात का भी सामना किया। अपने एक 109 वर्षों के सफर में संस्थान ने अर्श से फर्श तक के कई उतार चढाव देखे हैं। बुलंदियों के शिखर पर पंहुचने के बाद संस्थान को 15 जनवरी 2008 में संस्थान का वैक्सीन प्रोडक्शन लाइसेंस सस्पेंड का सामना भी करना पड़ा। इससे यहां कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों के भविष्य पर संकट के बदल छा गया था। लेकिन दो साल बाद 2010 में स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी आजाद ने लाइसेंस को रिवोक कर दिया था। स्वास्थ्य के क्षेत्र में विश्व विख्यात 109 वर्ष पुराने केंद्रीय अनुसंधान संस्थान (सीआरआई) कसौली एक शताब्दी से भी अधिक समय से जीवन रक्षक दवाओं के उत्पादन में अहम भूमिका निभा रहा है। संस्थान की स्थापना पांच मई 1905 को हुई थी। सर डेविड सेम्पल संस्थान के पहले निदेशक थे। उन्होंने 1905 में एंटी रेबीज वैक्सीन का अविष्कार भी संस्थान में किया था, जिसे सेम्पल वैक्सीन के नाम से भी जाना जाता है। अब तक सीआरआई का इतिहास गौरवमयी रहा है। अपनी दवाओं के उत्पादन से करोडों मरीजों का इलाज कर चुका है। देश की एकमात्र सेंट्रल ड्रग्स लेबोरेटरी 1940 में यहां स्थापित की गई थी, जिसमें देश में बनने वाली वैक्सीन की गुणवत्ता को जांचा और परखा जाता है।
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लाहौर में पास हुआ था संस्थान खोलने का निर्णय
कसौली। ब्रिटिशकाल में संस्थान खोलने के लिए 1893 में एक बैठक लाहौर में हुई थी, जिसमें तत्कालीन पंजाब प्रांत के कसौली को इसके लिए चुना गया। यहां पर पाश्चर संस्थान चल पड़ा। कुछ सालों बाद पाश्चर संस्थान को सीआरआई में तब्दील कर दिया गया। 1906 में सीआरआई ने देश में पहली बार सर्पदंश के इलाज के लिए सीरम और टायफाइड बुखार के लिए वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया। 1911 में यहां सेंट्रल मलेरिया ब्यूरो को स्थापित किया गया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान संस्थान ने भारी मात्रा में वैक्सीन का उत्पादन किया। 1914 में कसौली में टायफाइड तथा कोलरा, हैजा वैक्सीन का उत्पादन शुरू किया गया।
आहूजा बने स्वतंत्र भारत के पहले निदेशक
कसौली। आजादी के बाद लेफ्टिनेंट कर्नल एमएल आहूजा 1947-1955 तक पहले भारतीय निदेशक बने। 1979 में संस्थान में एमफिल, माइक्रो बायोलॉजी की कक्षाओं को शुरू किया गया। इसके अलावा पीएचडी, पैथोलॉजी बीएससी, एमएससी माइक्रो बायोलॉजी सहित अन्य कक्षाएं भी यहां चलती हैं। जेई और यलो फीवर वैक्सीन उत्पादन करने वाला यह संस्थान दक्षिण पूर्व एशिया का एकमात्र बड़ा संस्थान है। पूरे देश में दिमागी बुखार निरोधक टीके संस्थान की ओर से तैयार किये जाते हैं।

यह इंजेक्शन हो रहे तैयार
कसौली। कसौली में अफ्रिकन देशों में जाने से पहले लगने वाला यलो फीवर का इंजेक्शन तैयार किया जाता है। मुख्य उत्पाद संस्थान में एंटी सिरा, एंटी रेबीज वैक्सीन, डीटी वैक्सीन, टीटी वैक्सीन, डीपीटी ग्रुप ऑफ वैक्सीन, यलो फीवर वैक्सीन, जैपनीज एनसेफालिटिस वैक्सीन, डायग्नोस्टिक रीजेंट, एंटी डाग बाइट और एंटी स्नेक बाइट वैक्सीन एकेडी वैक्सीन, एंटी वेनम सीरम आदि अन्य यहां के मुख्य उत्पादन हैं।

जीएमपी स्तर हासिल करने वाला पहला संस्थान
कसौली। संस्थान सरकारी क्षेत्र में जीएमपी (गुड मेन्यूफेक्चरिंग प्रेक्टिस) के तहत वैक्सीन प्रोक्षण करने वाला पहला संस्थान का गौरव प्राप्त कर चुका है। संस्थान में करोड़ों की राशि से तैयार जीएमपी भवन तमाम उन आधुनिक सुविधाओं से लैस है, जो आज के समय में दवा उत्पादन में इस्तेमाल होती है।
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