यमुनाघाट, बातानदी व गिरिनदी के तट पर छठ पर्व की धूम

Shimla	 Bureau शिमला ब्यूरो
Updated Sat, 02 Nov 2019 07:36 PM IST
पांवटा साहिब के यमुनाघाट पर छट पूजन करते हुए प्रवासी परिवार।
पांवटा साहिब के यमुनाघाट पर छट पूजन करते हुए प्रवासी परिवार। - फोटो : NAHAN
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पांवटा साहिब (सिरमौर)। पांवटा साहिब के यमुनाघाट, बातानदी घाट और गिरिनदी तट पर छठ पर्व की खूब धूम रही। शनिवार शाम के समय पांवटा क्षेत्र में धुंध छाई रहने के कारण थोड़ी दिक्कतें जरूर रहीं जिससे सूर्य देवता के दर्शन नहीं हो सकें। लेकिन, श्रद्धालुओं ने सूर्यास्त के तय समय पर पूरे जोश और धूमधाम से सूर्य अर्घ्य और पूजा अर्चना कर पर्व मनाया।
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सिरमौर में पड़ोसी राज्यों के हजारों परिवार औद्योगिक इकाइयों, खनन माइनों समेत विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं। देश के बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और पड़ोसी देश नेपाल के हजारों परिवार यहां रहते हैं। पिछले एक दशक से पांवटा में भी पूर्वांचल राज्यों के हजारों श्रद्धालु छठ पर्व को पूरे धूमधाम से मना रहे हैं। शनिवार शाम को छठ पर्व प्रवासी परिवारों ने धूमधाम से मनाया। सिरमौर में भी पूर्वांचल के हजारों परिवारों ने पांवटा, सतौन, बातामंडी और अन्य नदी के तटों पर छठ पर्व मनाया। मान्यता है कि महापर्व में देवी षष्ठी माता और भगवान सूर्य को प्रसन्न करने को स्त्री-पुरुष दोनों ही चार दिनतक व्रत रखते हैं। पहले दिन यानी चतुर्थी को आत्म शुद्धि हेतु व्रत करने वाले केवल अरवा खाते हैं जो शुद्ध आहार होता है। पंचमी के दिन नहाय खाय होता है, यानी स्नान करके पूजा पाठ करके संध्या काल में गुड़ और नए चावल से खीर बनाकर फल और मिष्ठान से छठी माता की पूजा की जाती है। षष्ठी के दिन घर में पवित्रता एवं शुद्धता के साथ उत्तम पकवान बनाते हैं जो संध्या के समय पकवानों को बड़े बडे़ बांस के डालों में भरकर जलाशय के निकट यानी किसी पवित्र नदी, तालाब, सरोवर पर ले जाया जाता है। नदी या जलाशयों में ईख का घर बनाकर उन पर दीया जलाया जाता है। व्रत करने वाले स्नान कर इन डालों को उठाकर डूबते सूर्य एवं षष्ठी माता को अर्घ्य देते हैं। सूर्यास्त के पश्चात लोग अपने अपने घर वापस आ जाते हैं।

बिहार, यूपी और झारखंड निवासी नवीन श्रीवास्तव, संजय कुमार, राम स्वरूप, किरण, शेखर, हरि सिंह, कल्पना, रेखा, हरि सिंह, किशनपाल और देवेंद्र सिंह का कहना है कि पर्व के विषय में मान्यता यह है कि जो भी षष्ठी माता और सूर्य देव से इस दिन कुछ भी मुराद मांगते हैं, वह पूरी होती है। सूर्य को दंडवत प्रणाम करने का व्रत बहुत ही कठिन होता है। एकमात्र छठ पर्व ही ऐसा है, जिसमें व्रती डूबते हुए सूर्य को भी अर्घ्य देते हैं।
काफी कठिन रहता है 36 घंटे का निर्जला उपवास
प्रवासी महिलाओं अलका, सविता, काजल, मोनिका, सपना, निर्जला और कविता का कहना है कि लोक आस्था का महापर्व छठ गुरुवार से नहाय-खाय के विधि-विधान के साथ शुरू होता है। दूसरे दिन खरना पर भगवान सूर्यदेवता को भोग लगाने के बाद 36 घंटे का निर्जला उपवास शुरू होता है। इस दिन को लोक मान्यताओं में खरना के नाम से जाना जाता है। इसके प्रसाद में चावल, चने की दाल, पूरी, गन्ने का रस या गुड़ से बनी रसिया जैसी चीजें बनाई जाती हैं।

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