बूढ़ी दिवाली पर पारंपरिक लोकनृत्य हो रहे लुप्त

Sirmour Updated Sun, 16 Dec 2012 05:30 AM IST
शिलाई (सिरमौर)। बूढ़ी दीवाली के उपलक्ष्य में किए जाने वाले विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों में मुख्य तौर पर बुडियात, झैता, रासे, हारूले, करियाला, खेलटू, हिरण नृत्य, हाथी नृत्य व नगोजिया आदि प्राचीन संस्कृति की विरासत अब आंशिक रूप से रह गई है। यह लुप्त होने के कगार पर है।
क्षेत्र की एक सामाजिक संस्था हिमालयन जन कल्याण एवं सांस्कृतिक मंच सिरमौर के कार्यकर्ताओं ने लुप्त हो रही इन लोक संस्कृतियों पर शोध किया था। ग्रामीण स्वरूप से इसे प्राचीन वाद्य यंत्रों के साथ कैमरे में फिल्माया गया था। इसके अतिरिक्त पाटा नृत्य, झैता नृत्य व खेलटूओं का भी संस्था की ओर से फिल्मांकन किया गया। इस वर्ष भी संस्था गिरीपार क्षेत्र के गांव मोहराड़ में हाथी नृत्य पर शोध किया जा रहा है। इस हाथी नृत्य को कैमरे में कैद कर इसे क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत के रूप में संजोकर रखा जाएगा। सांस्कृतिक मंच के सांस्कृतिक समन्वयक वीआर नेगी ने बताया कि संस्था का मुख्य उद्देश्य है कि लुप्त हो रही क्षेत्र की संस्कृति को जिंदा रखा जाए। गांव मोहराड़ निवासी हाथी नृत्य के विशेषज्ञ बारूराम ने बताया कि इस शोध व उल्लास से ग्रामीणों में जोश है। लुप्त हो रही उनकी संस्कृति को संस्था के माध्यम से मंच व प्रचार मिल रहा है।
बिशन सिंह गुल्पर का कहना है आज भी ग्रामीण क्षेत्रों में प्राचीन संस्कृति मौजूद हैै। इसे हमें संजोए रखना है। इस प्रकार की संस्थाएं अगर संस्कृति पर काम करें तो इसे खूब बढ़ावा मिल सकता है। लोगों में भी जोश रहता है।

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