यूज एंड थ्रो की पालिसी से पीटीए शिक्षक मायूस

Sirmour Updated Thu, 25 Oct 2012 12:00 PM IST
नाहन (सिरमौर)। राज्य भर में 400 सौ से अधिक पीटीए शिक्षक पिछले 2 सालों से घर पर हैं। इनकी नियुक्ति वर्ष 2006 में जिलों के विभिन्न स्कूलों में की गई थी। जिला की बात करें तो 15 के करीब भाषा अध्यापकों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा था। पूरे जिले में 900 के करीब पीटीए शिक्षकों की भर्ती की गई थी, जिन्हें बाद में विभिन्न कारणों से नौकरी से निकाल दिया गया। बाद में इनकी संख्या 637 के करीब रह गई। जिला में अभी भी वर्तमान समय में लगभग 600 से अधिक शिक्षक पीटीए पर नौकरी कर रहे हैं। कांग्रेस की लापरवाही ने इन शिक्षकों को सब्जबाग दिखाए। मगर भाजपा की सरकार ने इनसे नौकरी छीन ली। न समय पर वेतन, न नियमित होने की कोई गारंटी। इन शिक्षकों के ऊपर शुरू से राजनीति का बोलबाला रहा।
पिछले 8 वर्षों के रिकार्ड में कांग्रेस सरकार सत्ता में रहते कुछ नहीं कर सकी। बाद में भाजपा सरकार ने सत्ता संभालते ही बाहर का रास्ता दिखा दिया। वर्ष 2007 में सरकार ने पीटीए शिक्षकों को बाहर करने के बहाने एसडीएम स्तर के अधिकारियों को पीटीए शिक्षकों के रिकार्ड खंगालने का काम सौंप दिया। शिक्षकों पर आरोप है कि इनकी नियुक्ति गलत ढंग से हुई। मगर शिक्षकों का कहना है कि नियुक्ति किसने की? तथा नियुक्ति के आदेश कहां से आए थे? पीटीए शिक्षकों के इन सवालों का जवाब कांग्रेस तथा भाजपा के पास नहीं है। आखिर राजनीति की इस बिसात पर पीटीए शिक्षकों का भविष्य किसने बर्बाद किया? यह जवाब देने के लिए कांग्रेस तथा भाजपाई नेताओं के मुंह पूरी तरह से बंद हैं।
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नाहन (सिरमौर)। किसी भी सरकार ने पीटीए शिक्षकों के बारे में गहराई से नहीं सोचा। पीटीए शिक्षकों ने पिछले छह वर्षों में संघर्ष किया है। सरकारें आती जाती रहेंगी। मगर रोजगार जीवन में सिर्फ एक बार ही मिलता है। रोजगार छीनने की बजाय, उसे सही तरीके से ढालने का काम राजनैतिक दलों को करना चाहिए।
-जोगेंद्र सिंह, जिला उपाध्यक्ष,पीटीए शिक्षक संघ
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नाहन (सिरमौर)। विश्व भर में जनसंख्या बढ़ रही है। ऐसे में रोजगार के रास्ते युवाओं के लिए तकरीबन बंद हो रहे हैं। अगर किसी युवा को रोजगार मिलता है तो उसे राजनीतिक रूप नहीं देना चाहिए। नेताओं तथा सरकारों को चाहिए कि वह रोजगार छीनने की बजाय उसे सही तरीके से समाज के सामने प्रस्तुत करें। शिक्षकों के मामले में राजनीति खतरनाक है।
-डा. सुरेश जोशी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षा विद

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