उदासीनता से संकट में सिरमौर की कृषि

Sirmour Updated Mon, 22 Oct 2012 12:00 PM IST
नाहन (सिरमौर)। जिस जिले की 90 प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर हो और वहां साल दर साल पहाड़ दरकने से लाखों टन मिट्टी बहकर हरियाणा, पंजाब एवं उत्तराखंड के मैदानी क्षेत्र में समा रही होे... भू क्षरण से सैकड़ों बीघा जमीन नष्ट हो रही हो, ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव से सूखती खड्डों पर निर्भर बंद पड़ी सिंचाई योजनाओं से किसान खेतों को पानी मिलने की आस लगाए हाें, इसके लिए जिम्मेदार जन प्रतिनिधि भी हैं और नौहराशाही भी। जिन्होंने कृषि को ध्यान में रखते हुए कोई दूरगामी कृषि आधारित योजना नहीं बनाई।
2825 वर्ग किलोमीटर में फैले सिरमौर जिले की 228 में से 219 पंचायतें सीधे कृषि एवं पशुपालन से जुड़ी हैं। कुल आबादी 530164 का नब्बे प्रतिशत यानी 477147 ग्रामीणों की आजीविका कृषि एवं पशुपालन से चलती है। साल दर साल औसत बारिश कम हो रही है। प्रलयकारी बरसात के मौसम में नदी नाले उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले जा रहे हैं।
सिरमौर जिले में 1990 से 2012 तक 149 नहर और कूहलें एवं 7 सिंचाई स्कीमें बंद हो चुकी हैं। 1078 हैंडपंप खराब पड़े हैं।
जिले में 90 प्रतिशत से अधिक ग्रामीण क्षेत्र कृषि पर आश्रित हैं। 71 प्रतिशत कृषि बारिश पर निर्भर है। इससे मौसमी एवं नकदी फसलों की पैदावार होती है। दुग्ध व्यवसाय भी बारिश एवं कृषि पर निर्भर है। जिला मंडी समिति के रिकार्ड के अनुसार जिले में एक वर्ष में 195 से 205 करोड़ तक नकदी फसलों, फलों एवं अनाज का कारोबार होता है। 50 से 60 करोड़ तक दूध एवं दूध से बनने वाले अन्य उत्पादों से कमाई होती है।
धौलाकुआं के प्र्रगतिशील किसानों भूराराम चौधरी, आजाद किसान क्लब के अध्यक्ष मायाराम चौधरी नरेश कुमार, सुनील चौधरी, दर्शन लाल, बागथन के किसान जमन सिंह और पीतांबर सिंह कहते हैं कि बारिश कुछ फसलों के लिए लाभदायक है, लेकिन अत्यधिक बारिश से नदी खड्डों में जो बाढ़ आती है, वह खेतों की उपजाऊ मिट्टी बहाकर ले जा रही है।

वर्ष वार्षिक बारिश
2012 887.3 मिलीमीटर
2011 802.9 मिलीमीटर
2010 1175.5 मिलीमीटर

27 हजार हेक्टेयर में होती हैं नकदी फसलें
जिले में कुल 27.01 हजार हेक्टेयर क्षेत्रफल में नकदी फसलें पैदा की जाती हैं। इनमें अदरक, लहसुन, टमाटर, फ्रासबीन, गोभी, आलू, प्याज, हरा धनिया, शिमला मिर्च, मूली, भिंडी, हरी मिर्च, खीरा, तोरी, करेला, कद्दू, लौकी, अरबी, जिमीकंद, कचालू, मक्की के अलावा आडू, सेब, प्लम, नींबू, खुमानी, केला एवं आम शामिल हैं।

29112 हेक्टेयर क्षेत्र में होता है अनाज पैदा
जिले में 29112 हेक्टेयर अनाज पैदा किया जाता है। सबसे उपजाऊ क्षेत्र पांवटा के बहुतायत के अलावा अन्य क्षेत्र में खेती के हिसाब से धान, गेहूं, सरसों, दालें, तिलहन एवं गन्ना पैदा किया जाता है।
यह क्षेत्र हैं नकदी फसलों एवं फलों को प्रसिद्ध
नौहराधार, हरिपुरधार शिलाई, गत्ताधार, सराहां, कफोटा, ददाहू, रेणुका जी, संगड़ाह, बागथन, राजगढ़, भरोग बनेड़ी, बिरला, बायला, महीपुर, सैनधार, पांवटा, आमवाला, कालाअंब, मिश्रवाला, सतीवाला, शंभूवाला आदि।

‘ सिरमौर की कृषि एवं पशुपालन का चिंतन कांग्रेस में डा. वाईएस परमार के जमाने से शुरू हो चुका था, जिसे कांग्रेस आगे बढ़ा रही है। पर्यावरण संरक्षण को लेकर राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसे बचाने के लिए समाज के हर वर्ग को आगे आकर चिंतन करना होगा ’
-जीआर मुसाफिर, कांग्रेस प्रत्याशी पच्छाद

‘कृषि प्रधान होने के बावजूद जिले में पर्याप्त सिंचाई सुविधा तो दूर यहां पीने का पानी की अकाल है। जल, जंगल जमीन को संरक्षण करना अत्यंत जरूरी है। भाजपा सरकार ने अपने पांच साल के कार्यकाल में चिंतन के साथ-साथ जरूरी कदम भी उठाए।’
-डा. राजीव बिंदल, भाजपा प्रत्याशी नाहन

‘ हिमाचली राज्यों के लिए सजग होने की जरूरत है। पहाड़ी जिलों से प्रतिवर्ष लाखों टन उपजाऊ मिट्टी मैदानी क्षेत्र में बह रही है। खोखले पहाड़ असहाय ग्रामीणों पर कहर ढा रहे हैं। भू क्षरण पहाड़ों को खोखला कर रहा है। पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का खामियाजा पहाड़ी जिलों को सूखे और बाढ़ के रूप में झेलना पड़ रहा है। हिमालयी राज्यों की जल, जंगल एवं जमीन खतरे में है’’
-डा. एपी जोशी निदेशक, हेस्को, उत्तराखंड

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