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तो यूं ही खाक होती रहेंगी ऐतिहासिक धराहरें

Rampur Updated Thu, 27 Dec 2012 05:30 AM IST
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आनी (कुल्लू)। क्या बुजुर्गाें के समय बनाए गए लकड़ी के मकान महफूज हैं? एक के बाद एक आगजनी की घटनाओं ने कई सवाल उठा दिए हैं। जरा सी लापरवाही इन मकानों पर भारी पड़ जाती है। आनी क्षेत्र में दर्जनों हादसे आगजनी के हुए हैं। इन हादसों में कई बहुमूल्य धरोहरें खाक हो गईं। बीते वर्ष आनी के किरण बाजार में दर्जन भर कमरे का एक मकान आग की लपटों के हवाले हो गया। इसी वर्ष च्वाई के तनोटा तथा चनोग में एक मकान जलकर खाक हो गया। गत दिनों तराला गांव में एक मकान जलकर नष्ट हो गया।
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आलम यह है कि प्रभावितों के पास जख्म पर मलहम लगाने के लिए भी मात्र आश्वासनों के अलावा कुछ नहीं है। इन घटनाओं में प्रभावित परिवार के तन में ढकने के कपड़ों के अलावा जिंदगी भर की जमा पूंजी भी जलकर नष्ट हो गई। सर्द भरी रातें खुले आसमान के नीचे प्रभावित परिवार काटने को मजबूर हो गए हैं। वे अपने लिए एक नए आशियाने के सपने संजो रहे हैं। कभी अग्निशमन केंद्र खोलने की कमी खलती रही, कहीं पानी की किल्लत पर भी बातेें उठती रहीं तो अब जागरूकता की कमी भी जनता में चरचा का विषय बना है। आलम यह है कि न अग्निशमन केंद्र खुला और न ही कोई जागरूकता शिविर लग रहे हैं। ऐसे में लकड़ी के मकानों पर संकट बरकरार बना हुआ है। इन्हें आग की लपटों से बचाने के कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हो रहे हैं।
आनी सचेत संस्था ने सरकार से मांग की है कि लकड़ी के मकानों को आग से बचाने के लिए सुरक्षा प्रदान की जाए। संस्था के अध्यक्ष डोला सिंह चौहान का कहना है कि क्षेत्र में आगजनी की दर्जनों घटनाएं होने के बावजूद सरकार की ओर से कोई स्थाई समाधान नहीं किया जा रहा है। पुख्ता प्रबंध न किए जाने पर ऐतिहासिक धराहरें यूं ही खाक होती रहेंगी।

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