कुदरत का उपहार है जंगली काफल

Mandi Updated Fri, 25 May 2012 12:00 PM IST

मंडी। गर्मियों के मौसम में जंगली फल काफल (काला भौरा) की भरमार है। मंडी जिला के ऊंचे इलाकों में पाए जाने वाले इस फल का वैज्ञानिक नाम माइरिका एसकुलेंटा है। इस जंगली फल पर वनस्पति विज्ञान के शोधार्थी सुरेश गौतम ने शोध कार्य किया है। लाल और गहरे लाल रंग के गुठलीदार रसीले छोटे फल का स्वाद जहां खट्टा मीठा होता है।
इस फल में औषधीय गुणों की भरमार है। गौतम के अनुसार काफल से स्फूर्ति वर्धक पेय बनता है। वहीं पर इसके सेवन से से छाती के रोग से लाभ मिलता है। वहीं पर यह अग्निवर्धक, भूख बढ़ाने वाला, उदर स्फीति और पेट फूलने जैसे रोगों को ठीक करता है। इसकी छाल भी गुणों की खान है। इससे दस्त रोकने वाली दवा तथा एंटीसेप्टिक का काम करता है।
इसका काढ़ा दमा, अतिसार, बुखार, पुरानी फेफड़ों की सूजन, रक्तातिसार जैसे रोगों में लाभदायक है। काफल के पेड़ की छाल चबाने से हल्के दांत दर्द को आराम मिलता है। खांसी, मसूड़े का दर्द, कान दर्द, बबासीर तथा गले के दर्द में भी गुणकारी है। सुरेश गौतम के अनुसार काफल का फल ही नहीं पूरा पौधा औषधीय गुणों से भरपूर है। जो कुदरत की अनमोल देन है। इससे मनुष्य के शरीर से जुड़े अनेक विकार ठीक हो सकते हैं। काफल की खेती किसी मनुष्य नहीं बल्कि कुदरती तौर पर यह हिमाचल के जंगलों में पनपता है। हर साल हजार क्विंटल काफल बाजार में बिकता है। जो बेरोजगारों के लिए स्वरोजगार का साधन बनता है।

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