चौहारघाटी से विलुप्त हो रही काष्ठकुणी शैली

Mandi Updated Tue, 22 May 2012 12:00 PM IST
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पधर (मंडी)। चौहारघाटी की शान काष्ठकुणी शैली महंगाई के इस दौर में धीरे- धीरे विलुप्त होने लगी है। घाटी के दूरदराज और सड़क से अछूते गांव में ही यह शैली अब देखने को मिलेगी।
भवन के निर्माण में द्रंग की चौहारघाटी में काष्ठकुणी शैली की अपनी अलग पहचान है। निर्मित पुराने मकानों शैली में मिट्टी के गारे और सूखे पत्थरों की चिनाई में लकड़ी का प्रयोग किया जाता है। टीडी पर रोक से भवन निर्माण की पारंपरिक शैली में अब परिवर्तन आने लगा है। मंडी जनपद के चौहारघाटी में भवन निर्माण में काष्ठकुणी शैली काफी मशहूर है। घरों की सजावट के लिए देवदार और कायल की लकड़ी में नक्काशी कर डिजाइनर मकान बनाए जाते थे। महंगाई की मार पड़ने से लोग घरों के निर्माण की पुरानी शैली को बदलने पर मजबूर हैं। कभी चौहारघाटी में कंक्रीट के मकान देखने को तक नहीं मिलते थे। घाटी के सड़क से जुड़े गांव में कंक्रीट के मकानों बनते हैं। मकानों के निर्माण के लिए लोहा से लेकर ईंट, रेत, बजरी, सीमेंट सब बाजार से खरीद कर घाटी के लोग अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं। हालांकि नई इस शैली को घाटी के लोग पसंद नहीं करते, लेकिन महंगाई के इस दौर में और लकड़ी के अभाव में लोगों को मजबूर होकर मकान निर्माण की आधुनिक शैली को अपनाना पड़ रहा है।
कई ऐसे मकान भी घाटी में निर्मित हुए हैं, जिनमें लकड़ी के थाम की जगह कंक्रीट के पिल्लर खड़े किए गए हैं। आधुनिक तरीकों से निर्मित किए जाने वाले रिहायशी मकानाें का दौर निरंतर जारी रहा तो इससे चौहारघाटी की रौनक बेरौनक में तबदील हो जाएगी।
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