सेब के पौधों में समय से पूर्व गिर गए पते 15-57-03

Shimla	 Bureauशिमला ब्यूरो Updated Thu, 06 Aug 2020 10:21 PM IST
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कुल्लू/खराहल। पहले ही ओलावृष्टि, तूफान और कई बीमारियों से कुल्लू जिला में सेब की फसल को काफी नुकसान हो चुका है। अब पतझड़ रोग के कारण समय से पहले ही सेब के पौधों के पत्ते गिरने लगे हैं। ऐसे में सेब की गुणवत्ता को लेकर भी बागवान चिंतित हैं।
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कुल्लू जिले में पिछले वर्षों के मुकाबले इस बार फसल कम है। बागवानी विभाग के अनुसार इस बार सेब का उत्पादन गत वर्ष की तुलना में काफी कम है। इस कारण बागवानों को आर्थिक तौर पर नुकसान होगा। पहले ही फसल पर ओलावृष्टि, अंधड़ और ड्रापिंग के कारण करोड़ों का नुकसान हुआ है। अब सेब के पौधों के समय से पहले ही पत्ते गिरने शुरू हो गए हैं। आमतौर पर सेब पौधों के पत्ते नवंबर महीने में गिरते थे। रोग की चपेट में आने के कारण सेब की गुणवत्ता पर भी असर पड़ रहा है। बताया जा रहा कि छायादार इलाकों के बगीचों में इसका प्रकोप सबसे अधिक है। इसका मुख्य कारण भूमि में नमी की मात्रा बढ़ना और शेड्यूल के अनुसार बगीचों में फफूंदनाशक का छिड़काव न करना माना जा रहा है। घाटी के बागवान अमित, देवराज नेगी, अमन ठाकुर, कैलाश ठाकुर, राम चंद, महेश शर्मा, अरुण ठाकुर, युवराज और सुरेश ने कहा कि सेब के पेड़ों में समय से पूर्व पतझड़ हो रही है। उन्होंने कहा कि बचे हुए पत्तों को बचाने के लिए बागवान चिंतित हैं। समय रहते बीमारी पर काबू नहीं पाया गया तो बचे हुए पत्ते भी गिर सकते है। इस संबंध में बागवानी विभाग के विशेषज्ञ उत्तम पराशर का कहना है कि अधिक छायादार क्षेत्रों में बीमारी का प्रकोप अधिक रहता है। धूप पूरी तरह न आने के कारण रोग ज्यादा फैल जाता है। शेड्यूल के अनुसार दवाइयों का छिड़काव नहीं करने से यह समस्या अधिक आती है। इसकी रोकथाम के लिए 500 ग्राम डायथेन, 100 ग्राम बेबीस्टीन घोल 200 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जाए तो रोग पर काबू पाया जा सकता है। पंद्रह दिन के बाद डायथेन या एंट्राकाल का छिड़काव करें।
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