लाहौलियों की तकदीर बदलेगी लावेंडर की खेती

Kullu Updated Thu, 20 Dec 2012 05:30 AM IST
उदयपुर (लाहौल-स्पीति)। औषधीय गुणों से भरपूर लावेंडर फूल की खेती प्रदेश के जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति के किसानों की तकदीर बदलेगी। प्रदेश के ऊपरी इलाकोंकी जलवायु लावेंडर फूल की खेती के लिए काफी अनुकूल मानी गई है। बाजार में इस फूल का तेल तीन से चार हजार रुपये प्रति लीटर से हिसाब से बिक रहा है। लिहाजा, प्रदेश के कबायली इलाकों के किसान-बागबान इसकी खेती से अच्छी आय कमा सकते हैं। लाहौल घाटी में लावेंडर की खेती के लिए जलवायु को अनुकूल माना जा रहा है। हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय और इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायो रिसर्च टेक्नोलॉजी पालमपुर जल्द ही लाहौल घाटी में शोध करेगा। शुरूआती दौर में संस्थान की पहल पर चंबा जिले के कई क्षेत्रों में लावेंडर की खेती के काफी अच्छे परिणाम सामने आए हैं। इसकी खेती से चंबा जिले के सलूणी और तीसा के कई किसानों की आर्थिक स्थिति बदली है।
हालांकि, सलूणी में इसका संयंत्र लगा है, लेकिन वहां के किसान विदेशों में लावेंडर की मांग के चलते तेल निकालने से पहले ही फूलों को बेचे देते हैं। इसको देखते हुए जैव संपदा एवं प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर (आईएचबीटी) के वैज्ञानिक लाहौल-स्पीति, किन्नौर, कुल्लू और अन्य जिलों के ठंडे इलाकों में भी लावेंडर की खेती को बढ़ावा देने के प्रयास में है।
शोधार्थी वैज्ञानिक लाहौल-स्पीति की बर्फीली जलवायु को इसकी खेती के लिए अनुकूल मान रहे हैं। हिमालयन प्रौद्योगिकी संस्थान के निदेशक डा. पीएस आहुजा ने कहा कि लावेंडर फूल में कई औषधीय गुण होते हैं। डिपरेशन के मरीजों पर लावेंडर का प्रयोग बेहद सफल रहा है। इस फूल के तेल की मालिश से इसके मरीजों को काफी राहत मिलती है।
आहुजा ने बताया कि अरोमा खेती के जरिए लावेंडर से सिर दर्द और डिपरेशन जैसे रोगों का उपचार करने में काफी मदद मिली है। लावेंडर के तेल से परफ्यूम, साबुन तथा अन्य कास्मैटिक वस्तुएं भी तैयार की जा सकती हैं।

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