पारंपरिक अनाज में कई रोगों का इलाज

Kullu Updated Tue, 27 Nov 2012 12:00 PM IST
कुल्लू। पारंपरिक खेती से मुख मोड़ने की परंपरा लोगों को कई घातक रोगों में भी धकेलते जा रही है। नकदी फसलों की ओर बढ़ता रुझान भले ही आधुनिकता के युग में सही है लेकिन पारंपरिक खेती की अपनी अहमियत है। इसे नकारा नहीं जा सकता। यह कहना है कुल्लू के बुजुर्ग लोगों का।
कौल्थ की खेती अब नाममात्र की हो रही। कौल्थ की दाल पत्थरी के मरीजों के लिए रामबाण मानी जाती है। इसके सेवन मात्र से पत्थरी चूरा बनकर बाहर निकल जाती है। कुल्लू में अब कोदरा, काऊणी, चीणी, सलियारा, बाजारा, जौ, कौल्थ और चूड़ीधार साग खाने की थाली से करीब गायब ही हो चुके हैं। कुछ अनाजों के बीज अब भी किसानों के पास है लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में इन अनाजों की बिजाई कम हो गई है। यह खाद्य सामग्री खाने में ही इस्तेमाल नहीं होती थी बल्कि कई बीमारियों की काट भी रखती थी। पारंपरिक अनाज का जैसे-जैसे इस्तेमाल बंद होता गया वैसे वैसे रोग भी बढ़ते जा रहे हैं।
मणिकर्ण घाटी के बुजुर्ग भाग चंद का कहना है कि अब लोग सब्जी पर ही निर्भर हैं। कौल्थ की दाल पत्थरी का इलाज करती है। अब पत्थरी की बीमारी तो आम हो गई है। पत्थरी की शिकायत की एक मात्र औषधी कौल्थ ही दाल ही थी। जौ से निकाली लुगड़ी नींगू से उल्टी दस्त का उपाचार होता था। कोदरा शुगर रोग के लिए रामबाण माना जाता है। चूड़ीधार साग से आयरन मिलता है। इससे कई बीमारियां खत्म होती थीं। वन्य प्राणी विभाग एवं ग्रास रूट इंडिया संस्था ने पारंपरिक खेती के प्रति लोगों को जागरूक करने का बीड़ा उठाया है। संस्था शिविर लगाकर पुरानी खेती करने के प्रेरित लोगों को जागरूक कर रही है। वन्यप्राणी विभाग के अरण्यपाल अजय श्रीवास्तव ने बताया कि पारंपरिक खेती के प्रति लोगों को जागरूक किया जाएगा। जीवीपंत के वैज्ञानिक जेसी कुनियाल का कहना है कि पारंपरिक अनाजों की वैल्यू अधिक है। लेकिन लोग इसकी ओर ध्यान देने में इच्छुक नहीं है।
आयुर्वेदिक डाक्टर बलदेव अवस्थी ने बताया कि पेशाब और पत्थरी के रोग में कौल्थ की दाल लाभदायक होती है। इसके अलावा शुगर के रोग में कोदरे का सेवन लाभदायक होता है।

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