तो सैकड़ों लोगों की चली जाती जान

Kullu Updated Sun, 05 Aug 2012 12:00 PM IST
मनाली। बादल फटने की घटनाओं में आखिर मजदूर ही क्यों शिकार बनते हैं? यह सवाल आम लोगों के जहन में एक यक्ष प्रश्न की भांति है। बिजली परियोजनाओं और नदी तटों पर चल रहे कार्यों में संबंधित कंपनी और सरकार की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में आ जाती है। लेकिन, सेरी नाला में ऐसा नहीं हुआ। यहां नदी तट पर कोई बस्ती नहीं बसी है। यदि नदी तट पर बस्ती बसाई होती तो कई मजदूरों को फिर अपनी जान से हाथ धोना पड़ सकता था।
हालांकि हर वर्ष घट रही ऐसी घटनाओं के बाद सरकार नए आदेश लागू करती है लेकिन अगले वर्ष सरकार और सभी विभाग इन आदेशों को भूल जाते हैं। इससे मजदूरों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ रहा है।
कांगली नाले में वर्ष 2004 में बादल फटने के कारण आई भयंकर बाढ़ में ग्रैफ के 7 और ठेकेदार के 37 से अधिक मजदूरों को जान गंवानी पड़ी थी। कइयों के तो बच्चे भी इस बाढ़ में बह गए। इस दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ने उसी दिन घटना स्थल पर पहुंचकर सुरक्षा का विशेष ध्यान रखने के निर्देश दिए थे। बावजूद इसके मजदूरों की कालोनियां नदी तटों पर बसाई जा रही हैं। रहने के अलावा पेयजल और शौचालय की बेहतर सुविधा नहीं मिल रही। हैरत की बात यह है कि ठेकेदार कंपनी में कार्यरत मजदूरोें का पंजीकरण और बीमा आवश्यक किया है लेकिन इसका पालन नगीं होता है।
वर्ष 2011 में जुलाई माह के अंत में फिंदरी नाले में बादल फटने से 14 मजदूराें को जान से हाथ धोना पड़ा था। हालांकि, मजदूर संगठन समय-समय पर पक्के मकान बनाने की मांग उठाते रहे हैं, लेकिन जिला प्रशासन और संबंधित विभागों ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की।

हकों न हो कोई समझौता
पर्यावरण विद एवं राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता किशन लाल ने कहा कि पर्यावरण और गरीब मजदूरों के हकोें से किसी प्रकार का समझौता नहीं किया जाना चाहिए। इस बार नदी तटों पर बस्तियां नहीं बसाई थीं। इससे जानी नुकसान होने से बचा जा सका है।

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