तस्करों की काली छाया में नागछतरी

Kullu Updated Tue, 15 May 2012 12:00 PM IST
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काईस (कुल्लू)। पेट की बीमारियों के लिए रामबाण नागछतरी जड़ी बूटी का अस्तित्व खत्म होने की कगार पर है। पर्यावरण प्रेमी इसका कारण नागछतरी का अधिक दोहन होना बता रहे हैं। इसकी कीमत का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह मार्केट में दो हजार रुपये प्रतिकिलो की दर से बिकती है। लिहाजा दाम अधिक होने के कारण कुछ लोग धड़ाधड़ इसके दोहन में लगे हैं। सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि नागछतरी की सप्लाई चीन तक हो रही है। पर्यावरण संतुलन में भी नागछतरी की अहम भूमिका रहती है। विशेषज्ञों के मुताबिक जिस जगह से नागछतरी को उखाड़ा जाता है वहां अन्य पौधों की संख्या भी घट जाती है।
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वन विभाग ने अब इस महत्वपूर्ण जड़ी बूटी को बचाने के लिए कमर कस ली है। विभाग ने इसके लिए विशेष टीम का गठन कर छापेमारी का अभियान छेड़ रखा है। नागछतरी ऊंचे घने वनों में पाई जाती और कुछ लोग इसका व्यापार कर चांदी कूट रहे है। जिला के कई क्षेत्रों में तो देवताओं के आदेश पर लोगों ने नागछतरी को न बेचने की कसमें तक खाई हैं। जीबीपंत संस्थान मौहल के विशेषज्ञ डा. एसएस सामंत ने कहा कि नागछतरी का अधिक मात्रा में दोहन पर्यावरण के लिए घातक है। कहा कि जहां से इसे निकाला जाता है वहां पौधों का अस्तित्व भी खत्म हो जाता है। नागछतरी दस्त और पेट की बीमारियाें में लाभदायक होती है।
वन अरण्यपाल पवनेश शर्मा ने बताया कि नागछतरी को बचाने के लिए विशेष टीम का गठन किया है। संभावित क्षेत्रों में छापेमारी अभियान छेड़ रखा है। वन्य प्राणी विभाग के अरण्यपाल अजय श्रीवास्तव ने बताया कि संभावित क्षेत्रों में फारेस्ट गार्ड को गश्त करने के आदेश दिए हैं। नागछतरी निकालता हुआ अगर कोई पाया गया तो उस पर कड़ी कार्रवाई होगी।
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