न शहीद स्‍मारक बना, न ही कोई बड़ा संस्थान

Hamirpur Updated Thu, 01 Nov 2012 12:00 PM IST
हमीरपुर। जिला हमीरपुर में लगभग 40 हजार वर्तमान और पूर्व सैनिक परिवार हैं। यहां की राजनीति में सैन्य परिवारों की अहम भूमिका रहती है। हर चुनाव में नेता पूर्व सैनिकाें की समस्याओं के समाधान के बड़े-बड़े वादे होते हैं, लेकिन पांच साल बाद स्थिति जस की तस ही रहती है। वन रैंक वन पेंशन के ऐलान के बावजूद पूर्व सैनिक संगठनों की मानें, तो न केंद्र और न ही प्रदेश सरकार ने पूर्व सैनिकों की मांगों को हल करने में रुचि दिखाई है। वायदों के बावजूद न हमीरपुर जिला में धर्मशाला की तर्ज पर शहीद स्मारक बन पाया और न ही शहीदों के नाम पर कोई बढ़ा शिक्षण संस्थान खुला। न पूर्व सैनिकों के पुनर रोजगार के लिए प्रदेश स्तर पर न कोई ठोस नीति बन पाई है और न ही उनके बच्चों की शिक्षा के लिए कोई विशेष सुविधा मिल पाई है।
पूर्व सैनिक वेलफेयर ऐसोसिएशन के अध्यक्ष स्क्वाड्रन लीडर बृजलाल धीमान कहते हैं कि भले ही केंद्र सरकार ने वन रैंक बन पेंशन का ऐलान किया है, लेकिन साल 2005 के बाद सेवानिवृत्त पूर्व सैनिकों को इसका लाभ नहीं मिल पाया है। एक्स पैरामिलिट्री वेलफेयर सोसायटी हमीरपुर के चेयरमैन श्रवण सिंह का कहना है कि पैरा मिलिट्री से रिटायर लोगों को नादौन के अलावा जिला में कहीं कैंटीन की सुविधा नहीं है। पूर्व सैनिक संगठनों के उपरोक्त पदाधिकारियों का कहना है कि पूर्व सैनिकों को सरकारी नौकरियों में 15 फीसदी आरक्षण नहीं मिल पा रहा है। शहीदों पर भले ही सरकार ने सड़कें बनाई हैं, लेकिन उनका रखरखाब नहीं हो पा रहा है।
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जिला में 40 हजार सैनिक परिवार
हमीरपुर जिला में ज्यादातर परिवार सैन्य पृष्ठ भूमि से हैं। जिला में लगभग 40 हजार सैनिक परिवार हैं। करीब 19 हजार पूर्व सैनिक परिवार हैं। जिला में 7293 सैनिक विधवाएं और 16 के करीब युद्ध विधवाएं हैं। जिला में 11 हजार 178 सैनिक सेवारत हैं, जो देश की सेवा में डटे हुए हैं।
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मजदूरी को मजबूर पूर्व सैनिक
अधिकतर सैंनिक 35 से 40 वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो जाते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन के अलावा कमाई का उनके पास कोई और साधन नहीं होता है। ऐसे में जिला के कई पूर्व सैनिक मजदूरी कर परिवार को पोषण कर रहे हैं। पूर्व सैनिकों के दोबारा रोजगार के लिए कोई ठोस नीति आज तक नहीं बन पाई है।

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