पहाड़ों के पीछे कैद है प्रदेश का स्वर्ग पांगी

Chamba Updated Tue, 18 Sep 2012 12:00 PM IST
पांगी (चंबा)। प्रदेश में अगर स्वर्ग है तो पांगी ही है। इस घाटी को प्राकृति ने जो खूबसूरती बख्शी है, उसे पहाड़ों ने कैद कर रखा है। आज तक इसे विश्व के सैलानियों की पहुंच में लाने के प्रयास नहीं हो पाए है। यहां के बाशिंदे स्वर्ग में होने के बावजूद उपेक्षित जीवन जीने को विवश हैं। यह घाटी छह माह तक सड़क सुविधा से कटी रहती है। यहां 12 माह कनेक्टिविटी का इंतजाम हो जाए तो पर्यटक मनाली व कश्मीर को भूल जाएंगे।
चंबा से जोड़ने के लिए साच पास से रास्ता तो निकाल दिया गया है। यह रास्ता कच्चा और खतरों भरा है। इसे खोलने में ही हर साल करोड़ों रुपए खर्च करते हैं और साल में करीब पांच माह इससे आवाजाही होती है। इसका फायदा स्थानीय लोगों को पलायन करने और साहासिक यात्रा करने वाले ट्रैकर ही उठा पाते हैं। इस घाटी की 16 पंचायतों में से हर एक पंचायत पर्यटकों के लिए गुलमर्ग से कम नहीं है। स्व. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय से ही इस ग्रीन घाटी को एक सुरंग बनाने के सपने दिखाए जाते रहे हैं। इस बीच कई सरकारें आई और चली गईं, मगर ये सपना आज तक हकीकत नहीं बन सका है।
चौहणी से बैरागढ़ तक मात्र छह किमी. लंबी इस सुरंग को बनाने की बात तो दूर इसकी डीपीआर तक नहीं बन सकी है। अगर यह सुरंग बन गई होती तो देश व विदेश के पर्यटक कश्मीर व स्वीटजरलैंड का विकल्प मिलता। फिल्म इंडस्ट्री तक के लिए यह वादी यूरोप से कम नहीं होती। छह माह तक बर्फ से लदी रहने वाली इस घाटी के बाशिंदे इस दौरान घर की कोठरी में पशुओं के साथ बंद होकर सर्दियों के जाने का इंतजार करने के बजाय पर्यटकों की खतीरदारी से लाखों रुपए कमा रहे होते। प्रदेश की आर्थिक स्थिति भी मजबूत होती। विस अध्यक्ष तुलसी राम का कहना है कि घाटी के विकास के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। मुख्यमंत्री का पांगी दौरा तय होने पर उन्हें सुरंग की घोषणा की उम्मीद है।

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