इतने बड़े हादसे से नहीं लिया सबक

Chamba Updated Mon, 13 Aug 2012 12:00 PM IST
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चंबा। जिले में अब तक के सबसे बड़े सड़क हादसे के बाद भी पुलिस और प्रशासन ने सबक नहीं लिया है। हादसे के 24 घंटे बाद ही रविवार को भी बसें ओवरलोड चलती रहीं। निजी बसों के अलावा सरकारी बसें भी अंदर से खचाखच भरी हुई थीं। शहर में ही पुलिस की व्यापक व्यवस्था और मणिमहेश मेलों के दौरान विशेष नाके लगे होने के बावजूद ओवरलोडिंग पर काबू नहीं पाया जा सका है। असल में जिला के ग्रामीण रूटों पर काफी कम बसें चलती हैं। कठिन भौगोलिक स्थिति होने के कारण लोकल रूटों पर सैकड़ों गांव निर्भर करते हैं। इस कारण जहां ग्रामीण भरी हुई बस में भी जबरन सवार होने को मजबूर होते हैं, वहीं निजी बसों के चालक और परिचालक इन्हें मना नहीं कर पाते। बताया जा रहा है कि अगर देहाती रूटों पर चल रही निजी बसों में तय मानदंडों के अनुसार सीट के अनुसार ही सवारियां बिठाई जाएं तो ग्रामीणों के लिए गंतव्य तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाएगा। वहीं, लोकल रूट होने के कारण निजी बस आपरेटरों को भी ओवरलोडिंग करने की मजबूरी होती है। अधिकतर सवारियां कुछ ही किलोमीटर तक की होती हैं। अगर वे इन्हें नहीं बिठाते तो लोग उनसे मारपीट तक करने को उतारू हो जाते हैं। इसके अलावा जिन रूटों पर सरकारी बसें चल रही हैं, वहां खुद ग्रामीण इनमें बैठना नहीं चाहते। निजी बसों में किराये में छूट मिलने के कारण वे सरकारी बसों की उपेक्षा करते हैं और जब एचआरटीसी घाटा होने पर रूट बंद कर देती है, तो चिल्लाना शुरू हो जाते हैं। हालांकि ऐसा हर जगह नहीं होता, मगर कुल मिलाकर ग्रामीण रूटों पर ऐसी परिस्थितियां बन गई हैं, कि लोकल अथारिटीज भी इस समस्या पर काबू पाने में असमर्थ हो रही हैं।
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वहीं, शहरी और प्रमुख मार्गों पर प्रशासन शिकंजा कस सकता है, मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है। एचआरटीसी और निजी बस आपरेटर यूनियनों के तालमेल के बिना जारी किए जाने वाले रूट परमिट भी परेशानी का कारण बन रहे हैं। कई जगह तो सरकारी बस के आगे और पीछे कुछ ही मिनट के फासले पर निजी बसें चल रही होती हैं। इस कारण सरकारी रूट घाटे में जाते हैं और इन्हें बंद कर दिया जाता है। एचआरटीसी के चालक-परिचालक भी मनमर्जी से चलते हैं। इससे लोगों का विश्वास सरकारी बसों पर से उठ रहा है।
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