सेक्चुरियों की कैद में छटपटा रही जिंदगी

Bilaspur Updated Mon, 29 Oct 2012 12:00 PM IST
बिलासपुर। जंगल में घुसने तक की इजाजत नहीं। लकड़ियां काटना तो दूर घासनियों से घास तक नहीं ला सकते। यह किसी एक व्यक्ति या परिवार की कहानी नहीं बल्कि सेंक्चुरी एरिया में फंसे हजारों लोगों की है। सेंक्चुरियों की कैद में फंसे सूबे के सैकड़ों गांवों के लोग बाहर निकलने को छटपटा रहे हैं। कमेटियां बनीं, कई बार दौरे हुए किंतु न जाने पेंच कहां फंसा है?
हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर, चंबा, मंडी, कुल्लू समेत कई जिलों में सेंक्चुरी क्षेत्र के रिहायशी इलाकों को बाहर करने की कवायद चली थी, किंतु अभी तक सिरे नहीं चढ़ पाई। प्रदेश के करीब 770 गांवों को सेंक्चुरी ऐरिया से बाहर करना है। लोगों पर कई बंदीशें है। यहां तक कि गांवों तक सड़क पहुंचाना तक मुश्किल है। बिलासपुर का नयना देवी क्षेत्र भी इसमें शुमार है। यहां करीब आठ पंचायतें नयनादेवी सेंक्चुरी ऐरिया में आती है। इन पंचायतों को बाहर करने के दावे तो बहुत हुए, किंतु हुआ कुछ नहीं। यही हाल कुल्लू, मंडी और चंबा का भी है। लोग कहते हैं कि चुनाव के दौरान नेताओं ने वायदे तो बहुत किए, लेकिन सत्ता मिली तो सब हवा-हवाई हो गया। सेंक्चुरी एरिया में रह रहे नयनादेवी के राजकुमार, कुल्लू के हरि राम कहते हैं कि यह उनकी बदकिस्मती है कि वह इस क्षेत्र में हैं। उनके तमाम वन अधिकार खत्म हो गए हैं। एक तरह से वह अपने ही घर में कुछ नहीं कर सकते।

इनसेट के लिए---
प्रदेश में कनावर, मनाली, काईस, खोखन, तीर्थन, सैंज, शिकारीदेवी, नागू, किब्ब्र, चंद्रताल, नेशनल पार्क, भावा, धारलाघाट, कालातोब, खजियार, चंबा आदि कई सेंक्चुरियां हैं।
पूर्व वन मंत्री राम लाल ठाकुर ने कहा कि 18 साल पहले प्रदेश में सेंक्चुरी एरिया की अधिसूचना जारी हुई थी। लोगों से आपत्तियां भी मांग गई थी, किंतु तत्कालीन भाजपा सरकार ने आनन-फानन में अधिसूचना जारी की और आपत्तियां दर्ज नहीं करवा पाए। फिर भाजपा की सरकार बनी और मामला ठंडे बस्ते में चला गया। वन मंत्री खीमी राम शर्मा भाजपा सरकार ने लोगों के हकूक का पूरा ध्यान रखा है। प्रदेश के लगभग 770 गांव सेंक्चुरी ऐरिया से बाहर किए जाने हैं।

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