नगर परिषद के समय तो होती थी सुनवाई

Yamuna Nagar Updated Thu, 20 Sep 2012 12:00 PM IST
यमुनानगर। नगर परिषदों को भंग कर नगर निगम तो बन गया, लेकिन ढाई साल में कालोनी वासियों के जीवन को नारकीय बनाने वाली समस्या का निदान नहीं हो पाया है। इस नाले को लेकर नगर परिषद कार्यालय के दर्जनों चक्कर काट चुके कालोनी वासी का संघर्ष अब भी जारी है।
इस नाले में जगाधरी की कई कालोनियों का पानी आता है। कई वर्ष पूर्व प्रोफेसर कालोनी में प्रवेश करते समय नाले को दो हिस्सों में बांट दिया गया। इससे नाले की निकासी प्रभावित हुई और हर बरसात के बाद प्रोफेसर कालोनी के घरों में तीन फुट तक पानी भरने लगा। प्रोफेसर कालोनी की गलियों में भी कई घंटाें तक पानी जमा रहता है। इससे लोग घर में कैद होकर रह जाते हैं। घरेलू सामान को बचाने के लिए प्रोफेसर कालोनी के लोगों ने अपने मेन गेट पर दो फुट ऊंच दीवार बनवाई। इस सीजन में पानी इतना अधिक आया कि दीवार फांदकर लोगों के घरों में घुस गया। कालोनी वासी चार वर्षों से इस नाले को डायवर्ट करने की मांग कर रहे हैं।
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समस्या जस की तस
प्रोफेसर कालोनी वेलफेयर एसोसिएशन के प्रेजीडेंट जीके भारद्वाज का कहना है कि नगर निगम बनने से हमें पूरी उम्मीद थी कि हमारी समस्या का हल निकल आएगा, लेकिन यह जस की तस है। फर्क इतना आया है कि पहले नगर परिषद ईओ से गुहार लगाते थे, अब नगर निगम आयुक्त जो कि जिले के उपायुक्त भी हैं, उनसे फरियाद की जा रही है।

पूर्व पार्षद मोहनी गुप्ता का कहना है कि नगर परिषद के कार्यकाल में पार्षदों की सुनवाई होती थी। नाले के पानी के ओवरफ्लो होने के बाद फोन पर ही पानी निकालने के लिए कर्मचारी आ जाते थे। अब नगर निगम कार्यालय के चक्कर लगाने पर भी सुनवाई नहीं होती। नगर निगम के जनप्रतिनिधि अब तक चुने नहीं गए हैं। अब तो निगम सिर्फ अधिकारियों के भरोसे चल रहा है।

प्रोफेसर कालोनी में रहने वाली संगीता सिंघल का कहना है कि नगर निगम बनने का हमें कोई फायदा नहीं हुआ है। नाले का गंदा पानी तो घरों में आता ही है। कालोनी के पीछे प्लाटों में कूड़ा डंप हो रहा है, जिसमें मक्खी-मच्छराें की भरमार है। पहले पार्षद से कहने से साफ-सफाई हो जाती थी। अब कोई सुनने वाला नहीं है। इससे अच्छे हाल तो नगर परिषद के समय में थे।

कालोनी में रहने वाले डीएवी सीसे स्कूल के पूर्व प्रिंसिपल सेवाराम का कहना है कि नाले की समस्या चार-पांच वर्षों से है। हर साल बारिश आने पर लोगों को अपने घरेलू सामान की चिंता सताने लगती है। हमारे लिए तो नगर परिषद और नगर निगम एक जैसे ही है। पहले भी समस्याओं के लिए अधिकारियों के चक्कर काटते थे, अब भी काट रहे हैं।

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