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कम अदालतों व न्यायाधीशों के चलते बढ़ रहे केस

Rohtak Bureauरोहतक ब्यूरो Updated Sun, 21 Apr 2019 03:02 AM IST
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रोहतक। इंडियन लॉ एसोसिएशन की ओर से शनिवार को एमडीयू के राधाकृष्णन सभागार में राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया गया। एम्पलाइमेंट आफ लॉ एंड इट्स फ्यूचर विषय पर हुए सेमिनार में वकालत क्षेत्र में रोजगार व इसके भविष्य पर मंथन करने के साथ पेंडिंग केसों पर चिंतन किया गया। बढ़ती आबादी वाले देश में कम अदालतों व कम न्यायाधीशों के चलते केसों का बोझ बढ़ना बताया गया।
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सेशन जज एएस नारंग ने कहा कि देश की विभिन्न अदालतों में करीब एक करोड़ केस पेंडिंग हैं। इन्हें निपटाने की जरूरत है। स्पेशल कोर्ट शुरू कर इस समस्या का समाधान किया जा सकता है। अदालतों की संख्या बढ़ाने के साथ स्पेशलाइजेशन की भी जरूरत है। टैक्सेशन के केस अलग होने चाहिए। पुलिस के लिए भी ला एंड ऑर्डर, क्राइम व सिविल केस अलग-अलग होने चाहिए। इससे हर स्पेशल अदालत में बेहतर काम होगा। स्पीडी ट्रायल के साथ ही केस की टाइम लाइन तय करना जरूरी है। इससे पेंडेंसी खत्म होगी।
केलीफोर्निया से आए नवनीत चुघ ने विधि विद्यार्थियों को अदालत में किए जाने वाले व्यवहार की जानकारी देते हुए इस व्यवस्था की बेहतरी व करियर की संभावनाएं बताई। उन्होंने केलीफोर्निया व भारत में तुलनात्मक अध्ययन करते हुए कहा कि वहां जीडीपी यहां के मुकाबले अधिक है। कोर्ट ज्यादा हैं। स्पेशल ज्यूडिशल ज्यादा हैं। इसलिए वहां केसों की पेंडेंसी नहीं है।
एमडीयू कुलपति प्रो. राजबीर सिंह ने विवि की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि देश की पहली लोकसभा में 50 प्रतिशत वकील थे। वर्तमान में यह आंकड़ा महज छह प्रतिशत है। ऐसे में लॉ संबंधी कानूनों व सुधार पर बात कम हो पाती है। विवि स्वच्छता में अव्वल रहने के साथ ही ए प्लस ग्रेड पाने का कीर्तिमान बना चुका है। यही नहीं पेटेंट व शोध पर भी काम किया जा रहा है।
डीन डॉ. एएस दलाल ने कहा कि विवि 1978 से विधि विभाग में भावी अधिवक्ता तैयार कर रहा है। यहां 1988 में मूट कोर्ट शुरू हुआ। यहां विद्यार्थियों को कोर्ट में किए जाने वाले व्यवहार की जानकारी दी जाती है। यही नहीं विवि अब तक 400 से ज्यादा न्यायिक अधिकारी, 500 से ज्यादा एडीए देश को दे चुका है। यहां महज चार हजार रुपये शुल्क में विद्यार्थियों को शिक्षा दी जाती है। जबकि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी व अन्य संस्थानों में यह शुल्क लाखों रुपये है। यहीं प्लेसमेंट एजेंसियां जाते हैं। जबकि से शिक्षण संस्थाएं सामाजिक मुद्दे के लिए बनी थी। अब ये व्यवसायी बन गई हैं।
इंडियन लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष सुशील जुनेजा ने कहा कि महिला सशक्तिकरण महज दिखावा है। वास्तव में महिलाओं की स्थिति अब भी खराब है। वर्किंग मदर की स्थिति इस सच से पर्दा हटाती है। सेमिनार में स्टार्टअप करने, टैक्सेशन, बैंकिंग, आर्बिटेशन व अन्य मुद्दों पर पैनल डिस्कशन भी हुआ। इस मौके पर मेयर मनमोहन गोयल, अधिवक्ता नवीन आलडिया, पुनीत पूनिया, राजीव गुगनानी समेत अनेक लोग मौजूद रहे।

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