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नोट के बदले चोट के बाद अब कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा

Rohtak Bureauरोहतक ब्यूरो Updated Sun, 21 Apr 2019 02:58 AM IST
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रोहतक। ‘नोट के बदले चोट’ कांड के खुलासे ने 2007-08 में चिकित्सा जैसे पवित्र पेशे की मर्यादा को धूमिल किया था, उसी तरह अब ‘कैंसर के मरीजों की मौत का सौदा’ भी इस पेशे की पवित्रता को दागदार कर रहा है। रोहतक पीजीआई के डॉक्टरों पर भी अब खाकी की नजर है। हैरानी तो इस बात की है कि संस्थान के रिकॉर्ड रूम में भी कैंसर से जुडे़ सौ से ज्यादा मरीजों की फाइलें गायब हैं। इस जांच में ये गायब फाइलें भी डॉक्टरों व स्टाफ के लिए मुसीबत के रूप में खड़ी हो सकती हैं।
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हरियाणा पुलिस की एसटीएफ सोनीपत यूनिट के खुलासे ने पीजीआईएमएस प्रबंधन के भी पसीने ला दिए हैं। क्योंकि कैंसर के कुछ मरीजों का रिकॉर्ड यहां पहले से ही गायब है। ऐसे में इन गायब हुए रिकॉर्ड की जांच में डॉक्टरों व स्टाफ से सवाल-जवाब होना तय है। संस्थान के पूर्व चीफ विजिलेंस अधिकारी डॉ. आरएस दहिया की मानें तो उन्होंने अपनी जांच के दौरान कुछ कैंसर रोगियों की फाइल मांगी थीं, लेकिन पता चला कि वह नदारद हैं। इसके लिए एफआईआर होने की बात सामने आई थी। लेकिन वर्तमान में जो खुलासा हुआ है, उससे इन गायब हुई फाइलों पर संदेह और बढ़ गया है। वहीं सोनीपत एसटीएफ की जांच में खुलासा हुआ है कि इस कांड में रोहतक के भी तार जुडे़ हैं और कैंसर का उपचार करने वाला पीजीआईएमएस ही है। संस्थान निदेशक डॉ. रोहतास कंवर यादव ने बताया कि शनिवार को उनके पास जांच की किसी टीम के आने की सूचना नहीं है। यदि कोई अधिकारी आता है तो उसकी जांच में संस्थान हर संभव मदद करेगा। सूत्रों की मानें तो पूर्व में गायब हुए रिकॉर्ड को पूर्व अधिकारियों ने बचा लिया, लेकिन वर्तमान की जांच इनके राज का पर्दाफाश करेगी।

नोट के बदले चोट का मामला
नोट के बदले चोट के मामले का 2007-08 में हिसार के तत्कालीन पुलिस कप्तान सुभाष यादव ने खुलासा किया था। इसमें 26 प्राइवेट व 28 सरकारी डॉक्टर 89 केस में संलिप्त मिले थे। इस मामले की जांच पीजीआईएमएस रोहतक के फोरेंसिक विभागाध्यक्ष डॉ. एसके धत्तरवाल के चेयरमैनशिप में हुई थी। इसमें डॉ. सीमा रोहिल्ला, डॉ. शालिनी अग्रवाल, डॉ. आकाश दीप अग्रवाल, डॉ. राज सिंह, डॉ. अंशुल चुघ, डॉ. ईश्वर सिंह, डॉ. विनीत भाई व सर्जरी के एक डॉक्टर ने इस मामले का पटाक्षेप किया था। यह मामला आज भी कोर्ट में विचाराधीन है। डॉ. धत्तरवाल ने बताया कि इस केस में सामने आया था कि मामूली चोट को डॉक्टर से मिलकर गंभीर चोट ऑपरेशन के माध्यम से बनाया जाता था। इसमें आरोपी पर गंभीर धारा लगती थी और वह मुसीबत में फंस जाता था। जब एक साथ कई केस सामने आए तो पुलिस अधिकारी को शक हुआ और जांच कराई तो सच्चाई सामने आ गई।

मरीजों की फाइल गायब होना नई बात नहीं, सवाल अधिकारी कैसे देते हैं एनओसी
संस्थान में मरीजों की फाइल गायब होना नई बात नहीं है। ऐसे मामले अकसर सामने आते रहते हैं। अधिकांश फाइलें कोर्ट के मामलों से जुड़ी होती हैं। इसमें सबूत के अभाव में आरोपियों को लाभ भी मिलता है। पुलिस स्वयं रिकॉर्ड न मिलने को लेकर परेशान रहती है। लेकिन संस्थान में डॉक्टरों की मनमानी के आगे सभी नियम कायदों की धज्जियां उड़ती रहती है। यहां विभागाध्यक्ष पीजी पर बात डाल देते हैं और जांच होने पर पीजी का अता-पता नहीं होता कि वह वर्तमान में कहां रह रहा है। ऐसे में सवाल उठाता है कि बगैर फाइल जमा कराए अधिकारी अपने जूनियर को एनओसी कैसे दे देते हैं।

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