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पीला रतुआ की बीमारी से किसान हो जाएं सचेत, आपके शहर में भी बीमारी आने की आशंका

Amar Ujala Bureauअमर उजाला ब्यूरो Updated Mon, 17 Feb 2020 01:39 AM IST
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जनवरी के अंत से लेकर फरवरी के अंत तक रहने वाली बीमारी पीला रतुआ आस-पास के शहरों में काफी मात्रा में फैल रही है। पीला रतुआ रोग के कारण फसलों में हल्दी के चूर्ण के जैसा दिखने वाला पाउडर जम जाता है, जोकि फसलों की पैदावार को रोक देता है। दरअसल यह बीमारी पीला कवक संक्रामक के फैलने से बढ़ रही है। जिसका नतीजा है कि शुरुआत में यह एक एकड़ में फसल में कुछ हिस्से में लगता है, जोकि बाद में धीरे धीरे बढ़कर फसल को बर्बाद कर देता है। पानीपत के आस पास के शहरों में काफी मात्रा में यह बीमारी अपना प्रभाव दिखा रही है। जिसका पानीपत में आने की आशंका जताई जा रही है। पानीपत कृषि संस्थान के वैज्ञानिकों ने किसानों को इस समस्या से राहत देने के लिए कहा है कि अपने खेतों में समय-समय पर जाते रहे। अगर ऐसी बीमारी दिखे तो वैज्ञानिकों की सलाह लेकर समय पर स्प्रे करते रहे और फिर भी बीमारी ठीक होने के अंश दिखाई न दे तो पानीपत अनाज मंडी कृषि संस्थान वैज्ञानिकों को बताए।
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पीला रतुआ के लक्षण
इस बीमारी में भी संक्रामक होते हैं जो हवा द्वारा अलग-अलग इलाकों में फैल जाते हैं। फसल के पत्तियों पर पीले पाउडर की परत जम जाती है। पीला रतुआ की परत जमने के बाद फसल में अनेक तरह और बीमारियां फैल जाती हैं। जिस कारण किसानों की फसल की पैदावार रुक तो जाती है और साथ ही उन्हेें आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है।
पीला रतुआ रोग के कारण
वैज्ञानिकों द्वारा जानकारी के मुताबिक अधिक नम वाले वातावरण और ठंडे मौसम मेें यह रोग पैदा होता है। इस बीमारी का मुख्य कारण है कि फसल में अधिक मात्रा में सिंचाई करना, सिंचाई किए हुए इलाके में भारी मात्रा में बारिश का होना, फसल में हफ्तों तक पानी न सुखना जैसी समस्याएं इस बीमारी के उत्पन्न होने का कारण बनती हैं। पीला रतुआ रोग के संक्रामक लगातार अन्य क्षेत्रों में फैल रहे हैं।
रोग के रोकथाम के उपाय
1. पीला रतुआ रोग के आते ही एक लीटर प्रोपीकेनाजोल दवाई का 200 लीटर पानी में प्रति एकड़ छिड़काव करें।
2. पहले स्प्रे से बीमारी दूर नहीं जाती तो 10 से 15 दिन के अंतराल में दोबारा स्प्रे करें।
3. इस बीमारी को देखते ही अधिकतर किसान नाइट्रोजन यूरिया उर्वरक का प्रयोग करते है, जिस कारण इस रोग और अधिक बढ़ावा मिलता है।
4. कम मात्रा में यूरिया खाद का प्रयोग करें।
5. समय-समय पर खेतों का दौरा करते रहें।
6. रोग को खत्म करने के लिए पीला रतुआ रोग प्रतिरोधी बीज की बुआई करें।
7. गेहूं की फसल की दो नस्ल एच 2967 व एच3086 विकसित प्रजातियां है, जोकि पीला रतुआ रोग मुक्त है।
8. बीमारी दिखते ही कृषि अधिकारियों से रोग को दूर करने के लिए सलाह लें।
बोले किसान
प्रदीप, रामफल, सुरेश, धर्म सिंह, रामकुमार आदि किसानों ने बताया कि पिछले वर्ष गेहूं की फसल में सबसे अधिक पीला रतुआ की बीमारी पाई गई थी। आस पास के सभी किसानों ने वैज्ञानिकों की सलाह लेकर बीमारी को दूर करने के लिए तरह तरह के स्प्रे किए थे, लेकिन हालातों को देखकर रोग की दोबारा आने की संभावनाएं जागी हुई हैं। पिछली बार इस रोग के कारण फसल में काफी नुकसान हुआ था। जिस कारण पिछले साल का फसल में हुआ नुकसान आज के बजट को बिगाड़ रहा है।
कृषि अधिकारियों को सूचित करें
नमी वाले क्षेत्रों में अक्सर यह बीमारी देखने को मिलती है। अगर टेंपरेचर बढ़ता है तो रोग के आने की आशंका कम हो सकती है। अगर फिर भी यह रोग देखने को मिलता है तो तुरंत कृषि अधिकारी को सूचित करें।
- राजेश भारद्वाज, कृषि एसडीओ
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