बाजारों से आते जाते, होती पानी-पानी बेटियां

Panipat Updated Mon, 01 Oct 2012 12:00 PM IST
पानीपत। ‘जब से हुई सयानी बेटियां, भूली राजी रानी की बिटिया, बाजारों से आते-जाते, होती पानी-पानी बेटियां’। कमलेश कुमार पालीवाल की इन पंक्तियों पर हाल में बैठे श्रोताओं को वर्तमान हालात पर सोचने को मजबूर कर दिया। मौका था अंकन साहित्यिक मंच की काव्य गोष्ठी का। काव्य गोष्ठी रविवार को आर्य पीजी कालेज में आयोजित की गई। हिंदी विषय पर गोष्ठी में कवियों ने आज के हालातों पर कविता पढ़कर गहरी चिंता जताई।
अंकन साहित्यिक मंच की काव्य गोष्ठी रविवार को आर्य पीजी कालेज में आयोजित की गई। इसके मुख्य अतिथि इंदिरा खुराना, विशिष्ट अतिथि हरभजन आजाद रहे। अध्यक्षता डा. रानी रजनी और मंच संचालन कमलेश कुमार पालीवाल ने किया। मंच के संरक्षक डा. एपी जैन ने हिंदी के महत्व पर प्रकाश डाला और इससे अपनाने का आह्वान किया। डा. एपी जैन ने हिंदी पर कहा कि हिंदी राज्य मनाए, हिंदी दिवस विडंबना है, अंग्रेजी से पिछड़ने को हिंदी दिवस विडंबना है, हिंदी मां, अंग्रेजी में पत्नी कहना चेतन भगत, सास खा रही बहू से भारी शिकस्त विडंबना है।
पवन चौधरी मनमौजी ने कहा कि हिंदी भारत वर्ष के माथे की उज्ज्वल बिंदी है, हिंद जगत में गर्वित है यदि गर्वित भाषा हिंदी है, मातृभाषी कौम का नहीं, जग में कोई नामोनिशान, और आखिर जीवित है वही कौम जिसकी मातृभाषा हिंदी है।
कमलेश कुमार शर्मा ने कहा कि वन, टू, थ्री सिखाते हैं, हिंदी की तीन भुलाते हैं, मम्मी को मोम बनाते हैं, डैडी को डैड बनाते हैं।
इंदिरा खुराना ने कहा कि समतल पर चलना सरल बहुत है, पर्वत की ऊंचाइयों ने सदा खींचा मुझको, गिरकर, चढ़कर चोट बहुत खाई मैंने, पर पर्वत को गले लगाकर चूम लिया है।।
रमेश चंद्र पुहाल पानीपती ने कहा कि तोड़कर दिल चल दिए, ये बेरुखी अच्छी नहीं, आशिकों से इस तरह की दिल्लगी अच्छी नहीं, दामन-ए-उम्मीद पुहाल थामकर कहने लगा, अब तेरे बिन इस जहां में जिंदगी अच्छी नहीं।।
अमित जांगड़ा पानीपती ने कहा कि कैसे इस गुलशन को विरान होने दूं, कैसे उन नजरों को बदनाम होने दूं, छुपा के रखे जो हैं मन में अब तक, कैसे उन राजों को सरेआम होने दूं।।
सुभाष भाटिया ने अपनी लाइनें कुछ यूं प्रस्तुत की कि एक सच्चाई कड़वी कहुं, सुनने को हो जाओ तैयार, कुर्सी लकड़ी की, अर्थी भी लकड़ी की हो रही अब तैयार, ये तो केवल विधाता ही जाने किसकी बारी पहली बार, अब भी संभल जाओ नेताओं, वरना खो बैठोगे परिवार।।
डा. दर्शनलाल आजाद ने कहा कि जिसने उसके हुकम की तामील नहीं, सारे जहां में उस सा कोई जलील नहीं, वह गुनाह माफ नहीं, करता तू समझ यह, वहां चलती कोई दलील कोई अपील नहीं।।
अजीत दीवाना ने कहा कि बेटा बेटी में न कोई फर्क करो, जरा इस पर तर्क वितर्क करो, उनको जीने का हक मिलने दो, नन्हीं कलियों को खिलने दो।।
हरभजन आजाद ने कहा कि गर बापू तुम जिंदा होते, देख देश का हाल, अन्ना की तरह तुमको भी करनी पड़ती भूख हड़ताल।।
सुलेख जैन ने कहा कि किस किस को क्षमा करुं, किस किस से क्षमा मांगू मैं, हर पांव में लकवा मारा है, हर राह में कांटे देखुं मैं।।
अजय जोशी ने कहा कि मैं हर इक निशानी मिटाने चला हूं, तुम्हारे खेतों को जलाने चला हूं, खुब आजमा कर सब दोस्तों को, तब हाथ दुश्मनों से मिलाने चला हूं।।
नरेश लाभ ने कहा कि झूमते हैं पत्र देखो, अपनी गठीली साख पर, पुष्प भी मदमस्त होकर गा रहे हैं डाल पर, गीत सुनकर झूमता भंवरा कहीं से आ गया, मंद-मंद मुस्कान संग रस प्रेम का पीने लगा।।

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