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12 साल में दोगुना हुआ फैक्टरियों से निकल रहा जहरीला पानी

Rohtak Bureauरोहतक ब्यूरो Updated Sun, 26 May 2019 11:21 PM IST
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पानीपत। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल बगैर अनुमति भूू-जल के प्रयोग और उसे दूषित करने पर सख्ती बरत रहा है। औद्योगिक इकाइयों पर कार्रवाई का निर्देश दे रहा है। यहां तक कि इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने का भी आदेश रहा है, जिससे कि भू-जल गंदा नहीं हो। लेकिन हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की कछुए से भी धीमी चाल में कोई फर्क नहीं पड़ा। इसका उदाहरण है कि बीते 12 वर्ष में पानीपत की औद्योगिक इकाइयों से निकलने वाला जहरीला पानी दोगुना हो चुका है। लेकिन इसके शोधन के लिए कॉमन ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता दोगुनी नहीं हो सकी है। नतीजतन शहर का भू-जल जहरीला होता जा रहा है और यह पानीपत के लोगों की सेहत के साथ सीधा खिलवाड़ है। इसका जिम्मेदार पूरी तरह से प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड है। जिले के भू-जल में 42 एमएलडी जलरीला पानी रोज मिल रहा है।
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एक साल से 42 एमएलडी का प्लांट तैयार, संचालन की मंजूरी नहीं : एनजीटी की फटकार के बाद 42 एमएलडी क्षमता वाला सीईटीपी बनाया गया, लेकिन इसे शुरू करने के लिए अनुमति यानी कंसेट टु ऑपरेट ही नहीं मिल रहा है। उद्योगपति लगातार सरकार से सीईटीपी को चालू करने की मांग कर रहे हैं, ताकि प्रदूषित पानी सड़कों पर या कच्ची जमीन में नहीं बहाया जाए और भूजल प्रदूषित ना हो, लेकिन कोई कदम नहीं उठाया जा रहा है। एनजीटी की सख्ती पर सिर्फ निरीक्षण होता है, रिपोर्ट तैयार होती है और फिर मामले की इतिश्री हो जाती है। फिलहाल पानीपत के सीईटीपी की क्षमता 21 एमएलडी की है, जबकि औद्योगिक नगरी से हर रोज 42 एमएलडी पानी निकलता है। अगर 42 एमएलटी का नया प्लांट शुरू जाए तो पहले से बने 21 एमएलडी के प्लांट को मिलाकर क्षमता 63 एमएलडी हो सकती है, जो पर्याप्त है। लेकिन इस पर ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है।
एनओसी लेने दिल्ली जाना होता है, राज्य में कोई व्यवस्था ही नहीं : भू-जल का प्रयोग करने के लिए उद्योगपतियों को सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड से अनुमति लेनी होती है, जिसके लिए उन्हें दिल्ली जाना होता है। इनकी अनुमति लेने के लिए प्रदेश में कोई व्यवस्था ही नहीं है। दिल्ली जाकर एनओसी लेने की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि कई उद्यमी बगैर एनओसी भू-जल का दोहन कर रहे हैं। उधर, एनजीटी बिना एनओसी के भू-जल का दोहन करने वाले उद्योगों पर कड़ी कार्रवाई के निर्देश दे चुका है। उद्योगपति सरकार से स्टेट ग्राउंड वाटर बोर्ड के गठन की मांग कर रहे हैं, ताकि भू-जल के दोहन के लिए एनओसी लेने में कोई दिक्कत ना आए।
फिलहाल मात्र 15 उद्योगों के पास ही है एनओसी : फिलहाल पानीपत के औद्योगिक सेक्टरों में सात हजार औद्योगिक इकाइयां हैं। लगभग सभी फैक्टरियां भू-जल का दोहन करती हैं। लेकिन मात्र 15 इकाइयों के पास ही भू-जल दोहन करने की एनओसी है। भू-जल प्राधिकरण ने राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से 15 दिन में इन फैक्टरियों पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
पानीपत के भू-जल में मिल चुकी है साइनाइड की मात्रा : केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने नवंबर 2018 में पानीपत के औद्योगिक सेक्टरों से भू-जल के सैंपल लिए थे। सैंपल रिपोर्ट में शहर के भू-जल में साइनाइड की 0.3 प्रतिशत मात्रा मिली थी। सीपीसीबी ने इसे जानलेवा करार देते हुए प्रदूषित पानी को भूमिगत जल में छोड़ने वाली फैक्टरियों पर कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।
49 करोड़ में बनकर तैयार हुआ है 42 एमएलडी क्षमता का सीईटीपी : 2014 में सरकार ने सेक्टर 29 पार्ट टू में 42 एमएलडी के सीईटीपी की क्षमता बढ़ाने के 49 करोड़ रुपये मंजूर किए थे। प्राधिकरण ने 2018 में जून में प्लांट का निर्माण कार्य पूरा कर दिया था। इसको चालू करने के लिए कई प्रकार के सर्टिफिकेट की जरूरत है। जिस कारण ये अब तक ये चालू नहीं हो पाया है।
कार्रवाई करने के लिए दिया है 30 दिन का वक्त : नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल के आदेश के बावजूद हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने करीब एक वर्ष तक औद्योगिक इकाइयों पर कोई कार्रवाई नहीं की। औद्योगिक इकाइयों पर केमिकल युक्त पानी को भू-जल में मिलाकर गंदा करने और अनापत्ति प्रमाणपत्र के बगैर भू-जल के प्रयोग का आरोप है। इस संबंध में तीन याचिका एनजीटी में डाली गई थीं। इसके बाद एनजीटी ने कार्रवाई का आदेश दिया था, लेकिन हरियाणा प्रदूषण बोर्ड ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की। जिस पर केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने सख्त कदम उठाते हुए हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को 15 दिन का वक्त आदेशों को लागू करने और 30 दिन वक्त औद्योगिक इकाइयों पर कार्रवाई कर रिपोर्ट सौंपने के लिए दिया है।
स्टेट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पानीपत के अधिकारियों ने साधी चुप्पी : गत 22 मई को सेंट्रल प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कार्रवाई करने के आदेश दे दिया और 30 दिन की डेडलाइन भी तय कर दी है। इस बारे में स्टेट प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पानीपत के क्षेत्रीय प्रबंधक भूपेंद्र चहल से पूरे मामले में उनका पक्ष जानने के लिए कई बार संपर्क किया गया। इसके साथ ही उन्हें मैजेस भी छोड़ा गया, जो उन तक पहुंच भी गया। लेकिन उन्होंने पूरे मामले में कोई प्रतिक्रिया देना ही उचित नहीं समझा, जबकि भू-जल जहरीला हो रहा है और उसे पीना खतरे से खाली नहीं है।
फिलहाल भूमिगत के दोहन के लिए एनओसी लेने में परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फिर भी उद्योगपति लगातार एनओसी लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी सरकार से मांग है कि प्रदेश स्तर पर भी प्रदेश भूमिगत प्राधिकरण का गठन होना चाहिए।
- भीम राणा, प्रधान डायर्स एसोसिएशन, पानीपत।
सीईटीपी को पर्यावर्णीय अनुमति मिल चुकी है, लेकिन कंसेट टु ऑपरेट की अनुमति नहीं मिली है। इसके लिए मुख्यालय को रिमाइंडर भेजे गए हैं। चुनाव खत्म हुए है, जल्द ही अनुमति मिलने की उम्मीद है।
- जगमाल सिंह, एक्सईएम, हरियाणा शहरी विकास प्राधिकरण।

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