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सस्ती दवाएं क्यों नहीं लिखी जातीं

Panchkula

Updated Tue, 21 Aug 2012 12:00 PM IST
पंचकूला। मेडिकल स्टोरों में एक समान साल्ट की महंगी और सस्ती दोनों दवाएं उपलब्ध होती हैं, लेकिन दवा कंपनियों और डाक्टरों की मिलीभगत से मरीज चाह कर भी सस्ती दवाएं नहीं खरीद पाते। उनमें भ्रम फैलाया जा रहा कि ब्रांडेड दवाएं रोग को जल्द ठीक करती हैं, जबकि सस्ती दवाएं समय लेती हैं। इस तरह चल रहा है यह खेल।
दरअसल डाक्टर साल्ट की बजाय ब्रांडेड कंपनी की दवा लिखते हैं, जबकि हरियाणा सरकार की तरफ से सरकारी डाक्टरों को साफ हिदायत है कि वे सिर्फ साल्ट लिखें।
जागो ग्राहक
यदि डाक्टर एक बार ब्रांडेड कंपनी की दवा लिख देते हैं तो ग्राहक वही दवा लेने की कोशिश करता है। यह बात रिसर्च में भी सामने आ चुकी है। सबसे बड़ी बात है कि दोनों के रेट में भारी अंतर होता है।
कंपनी दोनों दवाएं बनाती है
असिस्टेंट स्टेट ड्रग कंट्रोलर नरेंद्र आहुजा विवेक ने कहा कि कंपनी सस्ती और ब्रांडेड दोनों दवा बनाती है। ब्रांडेड दवा इसलिए महंगी होती है क्योंकि इसके मार्केटिंग के लिए एक अलग से नेटवर्क होता है। इस पर होने वाला खर्चा इन दवाओं से ही निकलता है। सस्ती दवाओं को कंपनी प्रमोट नहीं करती। हालांकि दोनों के साल्ट में एक फीसदी भी अंतर नहीं होता।
डिस्ट्रिक्ट केमिस्ट एसोसिएशन ने उठाया मामला
डिस्ट्रिक्ट केमिस्ट एसोसिएशन ने यह मसला पिछले दिनों हेल्थ डिपार्टमेंट के फाइनेंशियल कमिश्नर के सामने उठाया था। एसोसिएशन के संस्थापक प्रेसिडेंट बीबी सिंघल ने बताया कि भारत में सिर्फ 74 दवाओं के रेट कंट्रोल में है, बाकी दवाओं के रेट कंपनियां अपनी मर्जी से बढ़ा और घटा सकती हैं।
आप भी मांगें लो प्राइज ब्रांडेड मेडिसिन
बीबी सिंघल ने बताया कि शहर के सभी मेडिकल स्टोरों में कंपनी की महंगी और सस्ती दवाएं उपलब्ध होती हैं। लोग जेनरिक दवाओं की मांग करते हैं, लेकिन उनकी कोई पहचान नहीं होती। सबसे पहले लोगों के मन से यह बात निकालनी होगी कि ब्रांडेड और सस्ती दवाओं में अंतर होता है। यदि कोई उपभोक्ता लो प्राइज ब्रांडेड मेडिसिन मांगता है तो केमिस्ट को वही दवा देनी पड़ेगी।
क्या होती हैं जेनरिक दवाएं
यूरोपीय देशों में जो कंपनी दवा की रिसर्च करती है उसे दवा का 20 साल का पेटेंट मिलता है। 20 साल तक वह कंपनी अपनी मर्जी से दवा का दाम रख सकती है और नाम भी। उसके बाद वह दवा ओपेन हो जाती है। फिर कोई भी कंपनी बिना ब्रांड के यह दवा बनाकर बाजार में बेच सकती है। इन दवाओं को जेनरिक दवाएं कहा जाता है। भारत में इस तरह का कोई पैटर्न नहीं है।
महंगी दवाइयां----------------------- सस्ती दवाइयां------------------
ब्रांड नेम कंपनी मर्ज प्राइज दूसरा ब्रांड नेम कंपनी प्राइज
एर्टोलिप एफ सिपला कोलेस्ट्राल 94 रुपये एटकॉल एफ एरिस्टो 49 रुपये
टेक्सिम ओ 200 एल्केम एंटीबायोटिक 197 रुपये जिफी 200 एफडीसी 99 रुपये
ग्लाइकोमेट यूसीवी शूगर 67 रुपये जिग्लिम एमवन बायकॉन 20 रुपये
तेलमा ग्लेनमार्क बीपी 85 रुपये क्रेस्टर 40 सिपला 63 रुपये
निमुलिड पानासिए दर्द 58 रुपये निमिका आईपीसीए 12 रुपये
लिवोरिड सिपला एलर्जी 38 रुपये लिवोसिज स्वाइटोपिक 11 रुपये
(नोट सभी दवाओं के रेट एक पत्ते के हिसाब से दिया गया है।)
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