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हजारों अभिभावकों की आवाज बने पपनेजा

Panchkula Updated Mon, 30 Jul 2012 12:00 PM IST
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पंचकूला। कहते हैं कि दूसरों का दर्द वही महसूस कर सकता है कि जिसने खुद दर्द सहन किया हो। पिछले पांच साल से पंचकूला में यूनिवर्सिटी की मांग उठा रहे सुभाष पपनेजा का भी अनुभव कुछ ऐसा ही रहा। शहर में यूनिवर्सिटी न होने का खामियाजा खुद उनके बच्चों ने भुगता। पीयू में चंडीगढ़ का 85 प्रतिशत कोटा होने के कारण उनकी दोनों बेटियों को ग्रेजुएशन पंचकूला के कालेज से करना पड़ा। तीसरी बेटी को यह समस्या न आए इसलिए उन्होंने 11वीं क्लास से उसका एडमिशन चंडीगढ़ में करवा दिया, लेकिन उसे स्कूल भेजने और ले जाने में उन्हें काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। यहां पॉलीटेक्निक तक नहीं होने पर उनके बेटे को अंबाला से पढ़ाई करनी पड़ी। यह दिक्कत आज भी पंचकूला के हजारों अभिभावकों को उठानी पड़ रही है। खुद की तो परेशानी उन्होंने किसी तरह उठा ली, लेकिन दूसरों की परेशानी उनसे देखी नहीं गई। पड़ोसियों और दोस्तों की परेशानी देख उन्होंने 2007 में पहली बार यूनिवर्सिटी की मांग उठाई। उनकी इस मांग का पंचकूला रेजिडेंट वेलफेयर फेडरेशन ने भी समर्थन किया।
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समर्थन का ही नतीजा है कि वे लगातार पांच साल से प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह, यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी, मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा, केंद्रीय मंत्री कुमारी सैलजा, पूर्व शिक्षा मंत्री मांगे राम गुप्ता, मौजूदा शिक्षा मंत्री गीता भुक्कल और विधायक डीके बंसल को खत लिख रहे हैं। वे मानते हैं कि पीयू यूनिवर्सिटी पंचकूला के पास है, लेकिन यह बात दूर के ढोल सुहावने होने वाली है। चंडीगढ़ के विद्यार्थियों का 85 प्रतिशत कोटा होने के कारण पंचकूला के बच्चों को एडमिशन मिलना बहुत मुश्किल होता है। चंडीगढ़ हरियाणा की राजधानी है, लेकिन लोगों को कोई हक नहीं मिला। एडमिशन के लिए पंचकूला के अभिभावक दसवीं से ही हाथ-पैर मारने लगते हैं। पहली सरकारी यूनिवर्सिटी रायपुररानी, मोरनी और पंचकूला से करीब 150 किलोमीटर है। आज भी बच्चों को पेपर दिलवाने के लिए पंचकूला के अभिभावकों को कुरुक्षेत्र जाना पड़ता है। उनका कहना है कि जब तक यूनिवर्सिटी नहीं बनती तब तक उनका अभियान जारी रहेगा।

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