मोरनी ऐतिहासिक किले की दीवारों से रिसता पानी

Panchkula Updated Tue, 17 Jul 2012 12:00 PM IST
विज्ञापन

पढ़ें अमर उजाला ई-पेपर
कहीं भी, कभी भी।

*Yearly subscription for just ₹249 + Free Coupon worth ₹200

ख़बर सुनें
पंचकूला। ऐतिहासिक धरोहर के रूप में पहचान रखने वाला मोरनी का प्राचीन किला स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ीं यादों के रूप में जाना जाता है। बाहर से तो यह किसी युद्ध का गवाह माने जाने वाला किला लगता है, लेकिन अंदर जाते ही सारे पूर्वानुमान धरे के धरे रह जाते हैं। लोगों का स्वागत ही छतों से टपकते पानी से होता है। अधिकतर छतों से बरसात का पानी रिसता है। जगह-जगह दीवारों पर काई जमा है। कहीं से भी देखने से नहीं लगता है कि यह कोई प्राचीन किला है। अंदर कोई भी कैंटीन या जलपान की व्यवस्था नहीं है। यहां कीड़े और मकड़ी के जालों का बसेरा है। किले के आधे से ज्यादा हिस्से में अक्सर ताला लटका रहता है, जिससे यहां आने वाले सैलानियों को निराश लौटना पड़ता है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अंग्रेजों द्वारा ध्वस्त कर दिए गए ऐतिहासिक किले को रेनोवेशन के बाद एक अगस्त 2009 को पूर्व वन एवं पर्यटन मंत्री किरण चौधरी ने पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए लोकार्पित किया था।
विज्ञापन

आंदोलन से जुड़ी कोई वस्तु नहीं
सबसे हैरतंगेज बात यह है कि यह किला स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ा है, लेकिन यहां पर इस आंदोलन से जुड़ी कोई ऐसी चीज नहीं है। यदि बाहरी व्यक्ति कोई आ भी जाए तो उसे पता नहीं चल सकता है कि इस किले का इतिहास क्या है? किले के अंदर आज तक कोई दर्शनीय स्थल विकसित नहीं किया गया। इतना ही नहीं बाहर से आए सैलानियों के लिए कोई गाइड या मैप भी नहीं है, जिससे उन्हें इतिहास जानने और समझने में मदद मिल सके।
इसलिए लोग आते हैं दूर-दूर से
कभी मोरनी 14 छोटी-छोटी रियासताें में बंटा था। इन रियासतों के सरदार ठाकुर राजपूत थे, जो सिरमौर के राजा के अधीन थे। 17वीं सदी के अंत में रियासत के राजा ने खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया। इस बगावत को दबाने के लिए सिरमौर नरेश ने दिल्ली के दरबार से मदद मांगी। दिल्ली दरबार से हाकिम कासिम खान अपनी सेना के साथ यहां आया और खुद यहां का राजा बन बैठा। उसके बाद सिरमौर नरेश ने उसे यहां से खदेड़ दिया। 1810 में गोरखा राजा ने सिरमौर नरेश से यह क्षेत्र छीन लिया। करीब पांच वर्ष यह क्षेत्र गोरखों के अधीन रहा। कुछ समय बाद यहां अंग्रेजों की नजर पड़ी और उन्होंने 26 अक्तूबर 1816 को यह क्षेत्र मीर के वंशज मीर जफर खान को सौंप दिया। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में मीर वंशज ने भी स्वतंत्रता संग्रामियों की मदद की थी। इससे नाराज अंग्रेजों ने मोरनी किले को तोपों से उड़ा दिया था। उसके बाद इस किले को पर्यटकों के लिए तैयार किया गया और रेनोवेशन के बाद एक अगस्त 2009 को इसका लोकार्पण हुआ।
कोट
किले के बारे में सुना काफी था, लेकिन यहां आकर निराशा हुई। किले के इतिहास से जुड़ी एक भी वस्तु यहां पर नहीं है।
मनीषा अरोड़ा, पर्यटक
कोट
किले की दीवारों को छोड़कर यहां पर कोई भी दर्शनीय स्थल नहीं है। कम से कम मैप या गाइड तो होना चाहिए जो इसके बारे में बता सके।
अशोक, पर्यटक
कोट
मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। यदि ऐसा कुछ है तो इसकी जांच करवाई जाएगी।
छोटू राम, प्रिंसिपल चीफ कन्जरवेटर आफ फारेस्ट विभाग
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन

Spotlight

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Election
X

प्रिय पाठक

कृपया अमर उजाला प्लस के अनुभव को बेहतर बनाने में हमारी मदद करें।
  • Downloads

Follow Us