लड़की के सपनों पर भी बंदिशों का असर

Karnal Updated Mon, 28 Jan 2013 05:30 AM IST
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कैथल। आवर लाइव्ज...टू लिव नो टू जेंडर वाइलेंस नाम के फिल्म फेस्टिवल का शुभारंभ शनिवार दोपहर आरकेएसडी कॉलेज में सदियों से हिंसा की शिकार और इस दुनिया में जन्म न ले पाने वाली लड़कियों के लिए दो मिनट का मौन रखने के साथ हुआ।
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इस फिल्म फेस्टिवल का आयोजन संभव और आईएडब्ल्यूआरटी की ओर से स्त्री हिंसा के खिलाफ जारी अभियान वन बिलियन राइजिंग के तहत किया जा रहा है। आरकेएसडी कॉलेज की महिला विंग के सहयोग से फिल्म फेस्टिवल का आयोजन 26 जनवरी से शुरू हुआ। तीन दिवसीय फेस्टिवल के पहले दिन दिल्ली से आई संगत संस्था की दिव्या ने बताया कि पूरे देश में 40 अलग-अलग शहरों में महिलाओं पर केंद्रित लघु फिल्मों के महोत्सवों का आयोजन किया जा रहा है। महोत्सव में पहली फिल्म 1977 में हिंसा की शिकार औरतों और पूरी दुनिया मेें उनके संघर्षों के प्रण को संगीत और दृश्यों के माध्यम से दर्शाया गया।

दूसरी फिल्म निर्णय छोटे शहरों मेें निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की लड़कियों के छोटे-बड़े संघर्षों को बयां करती है। कई अंतराष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी रीना मोहन की फिल्म परिवर्तन महाराष्ट्र की तीन दलित सामुदायिक नायिकाआें की कहानी कहती है। इसमें दिखाया गया है कि उन्होंने अपने जीवन में स्वयं संघर्ष किया और फिर समुदाय की महिलाओं के संघर्षों में साझीदार हुईं। फिल्म के माध्यम से दिखाया गया है कि महिलाएं अच्छी मैनेजर होती हैं। पार्क, ग्राम सभाओं और सामुदायिक कार्यों में उनकी भूमिका को बढ़ाया जाए। कनुप्रिया वर्गीज के द्वारा बनाई गई अपराजिता फिल्म अंतराष्ट्रीय स्तर पर विद्यार्थी वर्ग में पुरस्कृत है। इसमें एक लड़की के सपनों पर समाज, परंपराओं और परिवार की बंदिशों को दर्शाया गया है। अंत में वह लड़की अपने सपनों को साकार करने के लिए सभी बंदिशों को तोड़ कर जिंदगी की नई उड़ान भरती है।
फिल्म प्रदर्शन के बाद पैनल के सदस्य एडीसी दिनेश सिंह यादव, प्रो. अमृत लाल मदान, इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा ने चर्चा की। चर्चा में कॉलेज की छात्र-छात्राओं, शिक्षकों और नगर के सामान्य नागरिकों ने हिस्सा लिया।

किराए की कोख का बढ़ा प्रचलन
फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन शास्त्रीय गायिका शुभा मुद्गल का वीडियो मन के मंजीरे, सुरभि शर्मा की कैन वी सी द बेबी बंप प्लीज और टू वूमैन एंड ए कैमरा दिखाई गई। सुरभि शर्मा की फिल्म में भारतीय समाज में बढ़ रहे किराए की कोख के प्रचलन को दिखाया गया है। इसके माध्यम से मेडिकल क्षेत्र, पेशे की नैतिकता, दवा कंपनियो व्यवसायी अस्पतालों के बढ़ते धंधे और षड्यंत्र को बारीकी से दिखाया गया है। फिल्म के बाद अपनी कोख किराए पर देने से महिलाओं की पीड़ा, उन पर पैसे के दबाव, उसके शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की चर्चा की गई। चर्चा पैनल में पीजीआई रोहतक के वरिष्ठ सर्जन आरएस दहिया और कैथल के वरिष्ठ सर्जन डॉ. राजेश गोयल ने भाग लिया। उन्होंने सेरोगेसी से जुड़े कानूनों के उल्लंघन की चर्चा की। आरएस दहिया ने कहा कि यह सब मेडिकल के कायदे-कानूनों के खिलाफ है।

संभव के डायरेक्टर कुमार मुकेश ने बताया कि तीन दिन तक चलने वाले इस फिल्म फेस्टीवल में सदियों से शोषित महिलाओं की पीड़ा उजागर हुई है। सोमवार को ये दिल्ली है मेरे यार, रोशन ब्यान, मोरालिटी टीवी, ऑवर लविंग जेहाद-एक मनोहर कहानी एवं बोल का प्रदर्शन किया जाएगा।

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