प्रोफेसर डा. देवव्रत पर गिरी गाज, नौकरी से हटाया

Karnal Updated Thu, 29 Nov 2012 12:00 PM IST
कुरुक्षेत्र। न्यायालय की अवमानना करने के मामले में कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी पर दायर केस की सुनवाई 3 दिसंबर को पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में होगी। मामला केयू के मीडिया और जनसंचार प्रौद्योगिकी संस्थान के एक शिक्षक की नियुक्ति और दोबारा ज्वाइन कराने से जुड़ा है। हालांकि बुधवार देर शाम केयू प्रशासन ने आनन-फानन में कार्रवाई करते हुए मीडिया और जनसंचार प्रौद्योगिकी संस्थान के शिक्षक डा. देवव्रत को रिलीव कर दिया है। डा. देवव्रत की नियुक्ति के समय उनकी योग्यताओं को दरकिनार कर केयू के मीडिया एवं जनसंचार संस्थान में रीडर के पद पर ज्वाइन कराया गया था। इस पद पर नियुक्ति के लिए डा. देवव्रत के पास आठ वर्ष का अनुभव होना चाहिए था, लेकिन छह वर्ष के लेक्चरर पद के अनुभव पर ही उन्हें इस पर ज्वाइन करा दिया गया। 2007 में इस नियुक्ति पर डा. आशुतोष मिश्रा ने एक याचिका दायर की थी और केयू द्वारा की गई नियुक्ति में सही मापदंड व उच्च चयन प्रक्रिया न अपनाने को लेकर चुनौती दी थी। वहीं, इस याचिका का निर्णय आने से पहले ही उपरोक्त शिक्षक ने केयू से छुट्टी लेकर महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी रोहतक में बतौर शिक्षक कार्यभार संभाल लिया। याचिकाकर्ता ने उनकी रोहतक की नियुक्ति को भी चुनौती दी थी, क्योंकि उसमें उक्त शिक्षक का केयू में शिक्षण अनुभव को आंका गया था। इसके बाद केयू ने आवेदन देकर केस इनफ्रेक्चुएश यानी रद करने को कहा था। केयू ने अदालत में अपना पक्ष रखते हुए बताया कि उपरोक्त शिक्षक अब सेवा में नहीं है, जबकि 2010 में पुन: उक्त शिक्षक को केयू के मीडिया एवं जनसंचार प्रौद्योगिकी संस्थान में ज्वाइन करा दिया गया। कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी द्वारा उच्च न्यायालय में दिए गए मोडिफिकेशन के आवेदन को न्यायालय ने नहीं माना था। बावजूद इसके उक्त शिक्षक केयू में कार्यरत रहा। इसके चलते याचिकाकर्ता ने इस प्रकरण को उच्च न्यायालय के संज्ञान में लाया कि किस तरह केयू द्वारा शिक्षक को ज्वाइन कराना न्यायालय की अवमानना है।
न्यायालय ने इसे स्वीकार करते हुए सही ठहराया और 16 नवंबर को केयू कुलसचिव डा. सुरेंद्र देसवाल को इस मामले में सफाई देने के लिए पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय में तलब किया था। बताना ये भी लाजिमी है कि दो दिन पहले जब अमर उजाला ने केयू प्रशासन से इस संदर्भ में जानकारी मांगी तो उन्होंने इस बारे में कोई ठोस जानकारी न देते हुए गोलमोल जवाब दिया था। वहीं इस मामले को गले की फांस बनता देख केयू प्रशासन ने आनन-फानन में डा. देवव्रत को नौकरी से रिलीव करने के आदेश दे दिए ताकि 3 दिसंबर को उच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई के दौरान कह सकें कि उन्होंने डा. देवव्रत को पद मुक्त कर दिया है।

केयू के दो और प्रोफेसर हैं निशाने पर
चित्तकार यूनिवर्सिटी पंजाब के मीडिया विभाग के डीन डा. आशुतोष मिश्रा के निशाने पर अभी केयू के इस संस्थान में कार्यरत दो और शिक्षक भी है, जोकि योग्यताओं को दरकिनार नियुक्ति किए गए थे। पता चला है कि डा. मिश्रा ने इनकी नियुक्ति बारे केयू के कुलपति तथा कुलाधिपति को पत्र लिखकर इसकी जानकारी भेजकर कार्रवाई की मांग की है।

अयोग्य शिक्षकों से मीडिया क्षेत्र के प्रति होगा अन्याय
डा. आशुतोष मिश्रा ने बताया कि मीडिया की शिक्षा में यदि अयोग्य व गैर जिम्मेदार प्राध्यापक नियुक्त होते हैं तो ये अंतत: विद्यार्थी वर्ग और मीडिया क्षेत्र के प्रति अन्याय होगा, जिसे रोकने के लिए वो 20 नियुक्तियों को विभिन्न प्रदेशों के उच्च न्यायालय में चुनौती कर लड़ रहे हैं। डा. मिश्रा ने न्याय प्रक्रिया पर विश्वास जताते हुए कहा कि मुझे पूरा यकीन है कि उन्हें इन सभी मामलों में सकारात्मक परिणाम हासिल होंगे।

इस यूनिवर्सिटी में आठ के खिलाफ याचिका
जबलपुर उच्च न्यायालय में भी उन्होंने मध्यप्रदेश के पत्रकारिता विश्वविद्यालय में हुई 8 पदों की नियुक्ति पर जनहित याचिका लगा रखी है। डा. मिश्रा ने नागपुर उच्च न्यायालय में दायर एक केस जीतकर वर्धा यूनिवर्सिटी के एक मीडिया प्रोफेसर को बाहर का रास्ता दिखा रखा है और दिल्ली उच्च न्यायालय में इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर मीडिया के चयन को चुनौती दे रखी है, जिसकी अगली सुनवाई 28 जनवरी 2013 को होगी।

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