देरी से बुआई को गेहूं की नई किस्म विकसित

Karnal Updated Sat, 24 Nov 2012 12:00 PM IST
करनाल। देश के उत्तर-पश्चिमी मैदानी इलाकों में गेहूं की देरी से बिजाई करने वाले किसानों के लिए अच्छी खबर है। गेहूं निदेशालय अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों द्वारा नई किस्म डीबीडब्ल्यू-71 तैयार की गई है। यह किस्म हाल ही में चिह्नित की गई है। यह किस्म अगले सीजन तक मार्केट में उपलब्ध हो सकेगी। यह किस्म देरी से बिजाई की जाने वाली वैरायटी है, जो अब तक मौजूद किस्मों से अधिक पैदावार देगी। वैज्ञानिकों के अनुसार यह वैरायटी जहां अब तक की देरी से बोई जाने वाली कई प्रजातियों से अधिक उपज देगी, वहीं पीला रतवा (येलो रस्ट रोग) की प्रतिरोधक क्षमता के जीन भी इस प्रजाति में है। सेंट्रल वैरायटल रिकमेडेशन कमेटी की ओर से इस प्रजाति को स्वीकृति मिलने के बाद किसानों को गेहूं की फसल में पीला रतवा से छुटकारा मिलेगा। तो वहीं उत्पादन अधिक होने से आर्थिक लाभ भी बढे़गा।

81 दिन में आती है बालियां
इस किस्म की गेहूं में 81 दिन में बालियां आती है। चार महीने से भी पहले 119 दिन में इस किस्म की गेहूं की फसल पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है। इसका औसत उत्पादन 43.2 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। अधिकतम औसत उत्पादन 60.4 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। इस लिहाज से यह प्रजाति अब तक देरी से बुआई की जाने वाली गेहूं की कई किस्मों में शामिल डब्ल्यूएच -1021, पीबीडब्ल्यू-590, डीबीडब्ल्यू-16, पीबीडब्ल्यू-373 और राज-3765 से बेहतर साबित हो रही है।

यह है औसत उत्पादन का रिकार्ड

वैरायटी का नाम उत्पादन क्विंटल प्रति हेक्टेयर
राज-3765 38.5
डब्लयूएच-1021 39.1
पीबीडब्ल्यू-373 39.7
डीबीडब्ल्यू-16 40.0
पीबीडब्ल्यू-590 40.2
डीबीडब्ल्यू-71 43.2


हाल में भारत में छह कृषि जोन
जलवायु के अनुसार भारत को कृषि के क्षेत्र में छह जोन में बांटा गया है। इस जोन में उत्तर पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर पश्चिमी मैदानी क्षेत्र, उत्तर पूर्वी मैदानी क्षेत्र, मध्य क्षेत्र, प्राय द्वीपीय क्षेत्र और दक्षिण पर्वतीय क्षेत्र शामिल है। वैज्ञानिकों के अनुसार हर क्षेत्र में जलवायु के मुताबिक कृषि की जाती है। जलवायु अनुकूल नहीं हो तो कृषि नहीं हो सकती।

इस किस्म से रुकेगा पीला रतवा
इस किस्म में पीला रतवा को रोकने के कुछ अलग प्रकार की जींस है। पीला रतवा गेहूं उत्पादकों के लिए बहुत बड़ी मुसीबत है। गेहूं की पूरी फसल खराब हो जाती है। ऐसे में किसान को बहुत नुकसान होता है। गेहूं निदेशालय अनुसंधान के वरिष्ठ वैज्ञानिक डा. एसके शर्मा और उनकी टीम ने यह प्रजाति तैयार की है। यह किस्म विशेष तौर पर पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड के तराई क्षेत्र, जम्मू कश्मीर का जम्मू जनपद और कठवा और हिमाचल के ऊना व पांवटा घाटी के लिए उपयुक्त है। इस किस्म की स्वीकृति होने की पूरी उम्मीद है। इस किस्म के आने के बाद किसानों को पीला रतवा से बड़ी राहत मिलने के आसार है।
डा. इंदु शर्मा, डायरेक्टर
गेहूं निदेशालय अनुसंधान, करनाल

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