दृढ़निश्चय ने बदली गांव और ग्रामीणों की जिंदगी

Karnal Updated Mon, 19 Nov 2012 12:00 PM IST
कैथल। जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूर स्थित देश के पहले मधु ग्राम गांव गोहरां खेड़ी में एक व्यक्ति की जिद ने पूरे गांव की तस्वीर बदल दी। सत्रह साल पहले दसवीं कक्षा के एक छात्र द्वारा देखा गया सपना पूरे गांव को खुशहाली के मार्ग पर ले आया है। गांव के बाबू राम द्वारा शुरू करने के बाद अब गांव में 90 प्रतिशत लोग मधु का उत्पादन करते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि सभी मधु उत्पाद पार्ट टाईम के तौर पर करते हैं। इससे कृषि एवं अन्य कार्यों से आमदनी से भी अधिक लगभग ढाई करोड़ रुपये की आमदनी होती है। कृषि विज्ञान केंद्र ने गांव में मधु उत्पादन के चलते देश के पहले मधु ग्राम का नाम दिया है।

1995 में मधुमक्खी पालन
गांव गोहरां में अनुसूचित जाति से संबंध रखने वाले बाबू राम ने दसवीं कक्षा के बाद मधुमक्खी पालन की शुरूआत की थी। बाबू राम बताते हैं कि उसके पिता गरीब किसान थे। इस कारण शुरू से ही कुछ कर गुजरने की तमन्ना थी। उसने अपने गांव संतोखमाजरा में मधुमक्खी का पालन करने वाले परिचित से कुछ जानकारी ली। इस काम को समझने के लिए यमुनानगर में सोमनाथ के यहां दो साल तक नौकरी की। बाद में कृषि विज्ञान केंद्र कैथल के वैज्ञानिकों के मार्गदर्शन में 1995 में 17 मधुमक्खियों के बाक्स खरीदकर अपना काम शुरू किया तो पीछे मुड़कर नहीं देखा।

180 परिवार कर रहे हैं काम
बाबू के बाद गांव वासी सतपाल ने काम शुरू किया। इसके बाद एक-एक कर गांव में सभी वर्गों के लोगों ने उनदोनों से प्रेरणा लेकर काम शुरू किया। इस समय करीब 200 घरों के इस गांव में 180 परिवार मधुमक्खी पालन में लगे हुए हैं। गांव वासी संजीव कुमार, काला सिंह, सुरेंद्र, ठाठ सिंह, रमेश कुमार, जगमाल, नरेश कुमार, सोनू शर्मा, नुकुल शर्मा, रामेश्वर प्रजापत, सुभाष, मांगे राम, श्याम लाल आदि ने बताया कि लगभग पूरा गांव मधुमक्खी पालन करता है। गांव वासियों ने बताया कि पहले बाबू, फिर सतपाल और उसके बाद तो हर घर में 10 से लेकर 300 से 400 तक मधुमक्खियों के बक्से हैं।

औसत आमदनी ढाई करोड़ की
गांव गोहरा में इस समय मधुमक्खियों के लगभग 6000 से अधिक बक्से हैं। इनमें एक बक्से मेें एक साल में 30 से लेकर 50 किलो शहद का उत्पादन होता है। शहद 80 से 85 रुपये प्रति क्विंटल बिक जाता है। इस प्रकार से उनकी लगभग 2 करोड़ रुपये तो औसतन आमदनी है। यदि उत्पादन अच्छा-खासा हो जाए तो यह आमदनी ढाई करोड़ रुपये तक हो जाती है। यदि अकेले गांव के मधुमक्खी पालन के लिए बक्से की कीमत लगाई जाए तो वह भी ढाई करोड़ रुपये से अधिक बनती है। यह गांव वासियों का पार्ट टाइम जॉब है। गांव में स्थाई कृषि कार्य से कुल आमदनी 2 करोड़ 5 लाख रुपये होती है।
गांव वासी संजीव कुमार बताते हैं कि सर्दियों में सरसों की फसल से मक्खियां मधु लेती हैं। इसके बाद सफेदे के पेड़ों, कीकर, कपास, बरसीम, सूरजमुखी की जून में फसल के बाद जून से लेकर अगस्त तक उन्हें चीनी भी खिलानी पड़ती है। जब इस क्षेत्र में फूल नहीं होते तो वे राजस्थान के अलवर, हरियाणा के चरखी-दादरी, रेवाड़ी सहित विभिन्न स्थानों पर लेकर जाते हैं।
वहीं गांव वासी संदीप ने बताया कि फसलों में ऐसे बीज आ गए हैं, जिनके फूलों से मधु नहीं निकलता। इस कारण पिछले तीन सालों से औसत उत्पादन ही चल रहा है।
उत्पादक सुरेंद्र सिंह के अनुसार मधु उत्पादन के बाद बेचने में परेशानी आती है। शहद के खरीददारी मनमनी करते हैं और शहद को मात्र 80 से 85 रूपये प्रति किलो ही खरीदा जाता है। जबकि वर्तमान में चीनी की कीमत ही 42 रुपये प्रति किलो से अधिक हो गई है। सरकार को इसके लिए दूसरे देशों की तर्ज पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देना चाहिए।

कृषि विज्ञान केंद्र ने दिया मधु ग्राम का नाम
कैथल कृषि विज्ञान केंद्र के मुख्य वैज्ञानिक डा. राजेंद्र श्योकंद ने कहा कि गांव गोहरां देश भर में उदाहरण है। इसी कारण इसे देश का पहला मधु ग्राम चुना गया है। गांव के लिए विशेष प्रोजेक्ट तैयार करके कृषि अनुसंधान परिषद को भेजा जा रहा है। ताकि यहां के उत्पादकों को प्रोसेसिंग यूनिट लगाने के लिए उचित सहायता मिल सके और उन्हें मार्केटिंग में परेशानी न आए।

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