चौहानों और पुंडीरों के इतिहास पर शोध शुरू

Karnal Updated Mon, 08 Oct 2012 12:00 PM IST
करनाल। पुरातत्व विभाग, वेदों और शिलालेखों को आधार मानकर देश के इतिहास पर 11 शोध ग्रंथ लिख चुके प्रमुख इतिहासकार डा. बिंध्यराज चौहान अब करनाल में जुंडला के चौहानों और पुंडीरों का इतिहास खंगालने पर जुटे हैं। हाल ही में विमोचन किए गए उनके प्रमुख ग्रंथ भारत के प्रहरी प्रतिहार, गोगा देव चौहान और अलावला का इतिहास लिखने पर क्षत्रिय इतिहास शोध संस्था ने उन्हें संस्था के मानद निदेशक की उपाधि देते गोल्ड मेडल से सम्मानित किया है।
इसके बाद वह पूंडीरों और जुंडला के चौहानों पर ग्रंथ लिखने की तैयारी में है। राष्ट्र के प्रहरियों पर इतिहास लिखने वाले गोल्ड मेडलिस्ट लेखक डा. बिंध्याराज चौहान का मानना है कि देश का गौरव लौटाने के लिए इतिहास की जानकारी होना बहुत जरुरी है, लेकिन आधुनिक समाज इतिहास से विमुख होता जा रहा है। भारत की संस्कृति मिटाने के लिए विदेशी शासक हजारों वर्षों से सक्रीय रहे, लेकिन देश के प्रहरियों ने उन्हें हमेशा मुंहतोड़ जवाब दिया। यही कारण है कि मुगल शासक फिरोजशाह तुगलक, सिकंदर लोधी और औरंगजेब ने अपने शासन में खास कर राजपूतों को अपना निशाना बनाया और उनके साथ युद्ध करके समाज का तानाबाना छिन्न भिन्न करने का प्रयास किया। लेकिन 730 ईस्वी में राजपूत महासंघ बनाकर राजपूतों ने देश के दुश्मनों के दांत खट्टे कर दिए। समाज को जागरूक करने के लिए क्षत्रिय इतिहास शोध संस्था ने बीड़ा उठाया है और समाज में फैली बुराइयाें को दूर करने के प्रयास किए जा रहे हैं।

ये है ग्रंथों की श्रृंखला
इतिहासकार डा. बिंध्याराज चौहान के ग्रंथों में चौलुक्य राजवंश का वृहद इतिहास, भारत का लियोनिडास वीरमदेेव चौहान, भारत के प्रहरी: प्रतिहार, वल्लभी के मैत्रक राजवंश का इतिहास, भारतेश्वर पृथ्वीराज चौहान इतिहास विष्यक भ्रांतियां और उनका निराकरण, गोगादे चौहान: परंपरा और इतिहास, अलावला का इतिहास, चौहान सरित्सागर, चौहान राजवंश के उद्भव का वृहद इतिहास, शाकंभरी माता का मंदिर और शाकंभर अजयमेरु का राजवंश, आशा पुरा माता का मंदिर और नाडोल का चौहार राजवंश शामिल हैं। उनका कहना है कि देश और समाज को जागरूक करने के लिए वह भविष्य में भी इस तहर के ग्रंथ लिखते रहेंगे।

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