6 जंग लड़कर बचाई थी हिंदुस्तान की शान

Karnal Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
कुरुक्षेत्र। द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध तक 6 लड़ाइयों में अपनी जान पर खेलकर भारत की आन-बान-शान को बनाए रखने वाले रिटायर्ड सूबेदार बिरखा सिंह के मन में आज भी सरकार द्वारा सम्मान नहीं दिए जाने की टीस बाकी है। द्वितीय विश्व युद्ध में नायक भर्ती हुए बिरखा सिंह ने 1942 में भारत की ओर से अंग्रेजों द्वारा भेजी गई सेना में अहम भूमिका निभाई थी, जिसके सम्मान में उन्हें इटली से स्टार और अंग्रेजों द्वारा वार मेडल दिया गया। इसके बावजूद न तो केंद्र सरकार और न ही हरियाणा सरकार ने इन्हें किसी भी सरकारी कार्यक्रम में सम्मानित किया। उन्हें रविवार को केयू में आयोजित हरियाणा शहीदी दिवस पर सम्मानित करने के लिए धरोहर हरियाणा संग्रहालय द्वारा बुलाया गया था। इस दौरान अमर उजाला से विशेष बातचीत में 90 वर्षीय रिटायर्ड सूबेदार बिरखा सिंह ने कहा कि रिटायर्ड होने के बाद केंद्र और हरियाणा सरकार ने उनकी कोई सुध नहीं ली, जिसका उन्हें मलाल है। 1942 के द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत से भेजी गई सेना में नायक रहे बिरखा सिंह ने बताया कि उन्होंने जर्मनी के खिलाफ युद्ध लड़ा था, जिसमें वे अंग्रेजों की सेना में थे। बिरखा सिंह ने द्वितीय विश्वयुद्ध के पलों को साझा करते हुए बताया कि अंग्रेजों ने भारत को आजाद करने की बात कहकर हमें भी इस युद्ध में शामिल कर लिया था और भारत से भेजी गई फौज में शामिल रहे। हिटलर की मृत्यु के बाद उन्हें जापान भेजा जाना था, लेकिन अमेरिका द्वारा परमाणु बम गिराए जाने पर वापस हिंदुस्तान भेज दिया गया और फिर 1947 में देश आजाद हो गया। बिरखा सिंह को 1948 भारतीय फौज में हवलदार के रूप में पदोन्नति मिली, जिस दौरान कश्मीर पर कब्जा करने के लिए पाकिस्तान द्वारा हमला कर दिया गया, उस दौरान उन्होंने भारतीय सेना की तरफ से लड़ाई लड़ी। वे 1949 में गोवा में पुर्तगालियों के साथ हुई लड़ाई में भी शामिल रहे। 1962 में वे सूबेदार बने और भारत-चीन युद्ध लड़ा और 1965 की जंग में भी शामिल रहे। 6 लड़ाइयां लड़ने के बाद 25 दिसंबर 1971 को फौज से सेवानिवृत्त हो गए। इस सेवाकाल में बिरखा सिंह ने अदमय साहस और बहादुरी से देश की सेवा की। इन सेवाओं के लिए उन्हें 5 मेडल भी मिले हैं। इसके साथ ही 1939-45 के द्वितीय विश्वयुद्ध में भाग लेने के लिए अंग्रेजी सरकार ने मेडल दिया, 1945 में ही इटली ने स्टार से सम्मानित किया, 1947 में भारतीय सेना ने वार मेडल दिया, 1948 में कश्मीर मुद्दे पर लड़ाई में हिस्सा लेने के लिए भारतीय सेना द्वारा मेडल दिया गया, 1965 में उन्हें भारत-चीन युद्ध के लिए वार मेडल मिला। सेना के इन सम्मानों के बावजूद सराकार ने कभी सम्मानित नहीं किया। सूबेदार ने बताया कि जब वे द्वितीय विश्वयुद्ध में जर्मनी के खिलाफ लड़ रहे थे तो वे इस दौरान विरोधी सैनिक की चलती मशीनगन छीन लाए थे, जिसके लिए उन्हें विक्टोरिया सम्मान से नवाजा जाना था, लेकिन उसी की बटालियन के एक हवलदार ने धोखे से उसका नाम कटवाकर अपना नाम लिखवा लिया था। वो पल उन्हें आज भी याद है और अकसर याद करके खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं।

आज भी हिंदुस्तानियों में है जुनून
आज के युवाओं पर उन्होंने कहा कि देशभक्ति का जोश और जुनून आज भी हिंदुस्तानियों में नजर आता है। जब भी देशभक्ति की बात की जाती है तो हमारे अंदर एक अदृश्य सा उत्साह पैदा हो जाती है और हमें कुछ कर गुजरने की हिम्मत पैदा कर देता है। देश की सरहदों पर हमारे जवान भी इसी उत्साह, शिद्दत व बहादुरी से लड़ते हैं।

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