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...ऐसे में कौन बढ़ाएगा किसी के मदद के लिए अपना हाथ

Karnal

Updated Tue, 14 Aug 2012 12:00 PM IST
करनाल। हर कोई कहता है जुर्म सहना और जुर्म होते देखना दोनों अपराध है। पर जब कोई जुर्म करने वालों के खिलाफ आवाज उठाता है, तो कोई उसकी बहादुरी को सलाम नहीं करता। वह भी तब, जब जुर्म किसी दूसरे पर हो रहा हो। ऐसा ही साहस दिखाया था सेक्टर सात के मुकेश अग्रवाल ने। जब उन्होंने एक युवक को हथियार बंद बदमाशों के हाथों लुटने से बचाने की कोशिश की थी। पर उनके इस साहस का सिला यह मिला कि गोली लगने के बाद किसी ने आज तक उनका हाल नहीं पूछा। हालांकि तब तो सबने मुकेश के साहस की सराहना की थी, लेकिन फिर उसके साहस को सब दो दिन में ही भूल गए। यहां तक कि प्रशासन ने भी उनके और उसके परिवार की पीड़ा समझने की जहमत अब तक नहीं उठाई।
13 अप्रैल को मुकेश ने दिखाया था साहस
सेक्टर सात निवासी 50 वर्षीय मुकेश अग्रवाल 13 अप्रैल 2012 की रात लगभग साढ़े नौ बजे अपने घर से सेक्टर 13 स्थित अपने पिता रामलाल अग्रवाल और बड़े भाई राकेश के घर मिलने के लिए जा रहे थे। सेक्टर छह के समीप हाईवे पर बने सेक्टर 14 निवासी तपन विश्वास को बाइक सवार तीन युवक तमंचे के बल पर लुटने की कोशिश कर रहे थे। इसी बीच वहां से गुजर रहे मुकेश ने तपन की चीख पुकार सुनकर इंसानियत का फर्ज समझते हुए अपनी कार साइड में रोकी और तपन के बचाव के लिए बदमाशों से भिड़ गए। इससे बौखलाए बदमाशों ने एकाएक उसपर तीन गोलियां दाग दी। ये गोलियां मुकेश की कनपटी, पेट व आंत में लगी। इसके बाद करनाल के निजी अस्पताल में लगभग चार घंटे लंबे आपरेशन में डॉक्टर मुकेश के शरीर से एक गोली निकालने में सफल रहे। लेकिन हालत गंभीर होने पर डॉक्टर ने उसे मोहाली के मैक्स अस्पताल में रेफर कर दिया। लाखों रुपये से उपचार कराने के बाद मुकेश की जान तो बच पाई, लेकिन मुकेश की 60 प्रतिशत एफिशिएंसी डाऊन हो गई।

ये हैं अब हालात
अब मुकेश कुछ नहीं कर पाता केवल घर पर गुमसुम होकर बैठा रहता है। इतने बड़े हादसे के बाद मुकेश के परिजनों के मन में टीस है कि न तो प्रशासन ने उनकी सुध ली और न ही उनके समुदाय के लोगों ने उनका साथ दिया। मुकेश की कनपटी में लगी गोली को ऑपरेशन के द्वारा भी नहीं निकाला जा सकता है। बेहद नाजुक हालत होने के कारण डाक्टरों की सलाह है कि गोली को अंदर ही रखा जाए। इससे मुकेश का स्वास्थ्य लगातार गिर रहा है। दूसरा इस मामले में जब मुकेश के परिजन पुलिस से हमलावरों के बारे में पूछते हैं तो उन्हें एक थाने से दूसरी चौकी और कभी एसपी दफ़्तर के चक्कर कटाए जाते हैं। इससे परिजन बेहद हताश और निराश हैं।

भूल गए मुकेश की बहादुरी को
मुकेश अग्रवाल ने अपनी जान की बाजी लगाकर तपन को लुटने से तो बचा लिया, पर उसकी इस बहादुरी को हर किसी ने नजरअंदाज कर दिया। अगर ये काम किसी पुलिस कर्मी ने किया होता तो संभव था कि उसे पुलिस पदक देने तक की सिफारिश होती। लेकिन प्रशासन ने मुकेश को सम्मानित करने तक की जहमत नहीं उठाई। मुकेश के पिता रामलाल अग्रवाल, पत्नी मंजू और बेटा तुषार कहते हैं कि प्रशासन या सामाजिक संस्था तक ने उन्हें याद नहीं किया। उनको इस अनदेखी का मलाल है, पर क्या कर सकते हैं, जहां सबकुछ सिफारिश से होता हो।
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