यहां नियमों को ताक पर रखकर चलता है सदन

Faridabad Updated Sat, 08 Dec 2012 05:30 AM IST
फरीदाबाद। नगर निगम स्थानीय सरकार (लोकल गवर्नमेंट) होता है। इसके पास एक्ट में इतनी पावर है कि इसके जन प्रतिनिधियों की तूती बोले। लेकिन, यहां उल्टा हो रहा है। एक्ट की जानकारी नहीं होने एवं राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण इस संस्था पर नौकरशाही हावी है।
बेशक फरीदाबाद नगर निगम प्रदेश का सबसे पुराना निगम है। यहां शुरुआती दौर में ज्यादातर काम नियमों के तहत होते थे। मेयर कमिश्नर के कार्यालय में नहीं बल्कि कमिश्नर मेयर के कार्यालय में आते थे। लेकिन, बदले वक्त में यहां सदन की बैठकों के संचालन से लेकर मेयर की गरिमा तक में गिरावट आई है। परिणाम यह है कि नौकरशाही ने जन प्रतिनिधियों को बौना बनाया हुआ है। नौकरशाह जैसे चाहते हैं वैसे ही सदन चलता है। मेयर हाथ मलते रह जाते हैं।
यहां अव्वल तो जनता के लिए बैठक ही नहीं होती। म्यूनिसिपल कारपोरेशन एक्ट-1994 की धारा 52 की उपधारा एक के तहत ऐसा प्रावधान है कि हर महीने बैठक हो। जबकि यहां आमतौर पर 88 या 89वें दिन या फिर 70 दिन के बाद बैठक होती है। क्योंकि, नियम यह है कि लगातार 90 दिन बैठक नहीं हुई तो सदन भंग मान लिया जाएगा। इसलिए मेयर से लेकर पार्षद तक सब के सब सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने के लिए बैठक करते हैं। हर बार सदन में कसमें खाते हैं कि अब हर माह बैठक होगी, ताकि समस्या का समाधान हो जाए लेकिन ऐसा होता नहीं है।
शहर के प्रथम मेयर सूबेदार सुमन कहते हैं कि राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यहां मेयर की गरिमा कम हुई है।
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सबसे पुराने निगम सदन का है ये हाल
-नौकरशाही का दखल इतना है कि सदन के अध्यक्ष मेयर निगमायुक्त से पूछते हैं कि बैठक कब रख लूं। इसके बाद निगमायुक्त जिस तारीख को कहते हैं मेयर उस पर राजी हो जाते हैं। वैसे मेयर को बैठक की तारीख तय करने का पूरा अधिकार है।
-एक्ट के मुताबिक मेयर निगमायुक्त को अपने कार्यालय बुला सकता है। मेयर नगर निगम प्रशासन का मुखिया है। लेकिन, यहां उल्टी गंगा बहती है। मेयर खुद उठकर निगमायुक्त के यहां जाते हैं।
-यहां अधिकांश बैठकों में शून्यकाल नहीं होता। कभी घोषणा भी नहीं होती कि अब शून्यकाल शुरू हो गया है। होता यह है कि पार्षद एजेंडे पर आने से पहले ही एक से डेढ़ घंटा हंगामा मचा लेते हैं।
(कायदे से सबसे पुराना नगर निगम होने के नाते यहां से गुड़गांव सहित अन्य निगम कुछ सीखते, लेकिन यहां पर पहले से ही हाल बुरा है)।
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कैसे चलना चाहिए सदन:
-जितने भी नीतिगत मुद्दे रखे जाएं उन सभी पर चर्चा हो। बिना पढ़े और चर्चा के बजट न पास हो।
-बैठक में हंगामा न हो इसके लिए एक-दो दिन पहले ही सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए।
-बैठक की इलेक्ट्रॉनिक रिकार्डिंग हो। अध्यक्ष, सदस्य जो कुछ भी बोल रहे हैं वह कार्यवाही रिपोर्ट में जरूर लिखा जाए।
-शून्यकाल जरूर रखा जाए। मेयर ऐसे मुद्दे रखें जिसके सदन में गिरने की संभावना न हो। अन्यथा मेयर की स्थिति खराब होती है।
-एक्ट के मुताबिक हर माह बैठक हो। ऐसा संभव नहीं है तो कम से कम दो माह में बैठक जरूर करें। ताकि, जनता की समस्याओं का निदान हो जाए।
-अधिकारों की जानकारी लेने के लिए स्थानीय निकाय से संबंधित ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट, ऑल इंडिया मेयर काउंसिल एवं हिपा (हरियाणा इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) की मदद ली जा सकती है।
(शहर के प्रथम मेयर सूबेदार सुमन से बातचीत पर आधारित)।
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कुछ अजब-गजब:
-दिसंबर 2011 में नगर निगम सदन 145 बाद चला। बीच में बैठकें हुईं लेकिन स्थगित हो गईं। इसमें भी बिना पढ़े ही सदन पटल पर रखे गए 73 मुद्दे पास कर दिए गए।
-आमतौर पर सदन की बैठक एक दिन में ही खत्म हो जाती है। जबकि यहां अगस्त 2012 में 21-22 दो दिन बैठक चली।
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जब मेयर के दो प्रस्ताव गिरे
-मेयर का कोई प्रस्ताव गिर जाए तो इसका मतलब यह माना जा सकता है कि सदन की आस्था उनमें नहीं है। यहां 19 अप्रैल 2012 को ऐसा हुआ। मेयर का एक प्रस्ताव गिरा और एक उन्हें वापस लेना पड़ा।
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राजनीतिक गलियारे में आगे नहीं बढ़े मेयर:
-मेेयर भले ही शहर के प्रथम नागरिक हों। एक्ट ने उन्हें बहुत अधिकार दिए हुए हों। लेकिन, उनका प्रयोग न करने के कारण ही कभी वे जनता में लोकप्रिय नहीं हो पाए। अब तक एक भी मेयर विधायक नहीं बन सका। अलबत्ता पार्षद एवं सीनियर डिप्टी मेयर विधायक और मंत्री बने। भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष एवं विधायक कृष्णपाल गुर्जर पार्षद से विधायक और मंत्री (बंसीलाल सरकार में) बने। शारदा राठौर पार्षद से विधायक बनीं और सीनियर डिप्टी मेयर से शिवचरण लाल शर्मा प्रदेश में मंत्री हैं।

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