63 वर्ष का हुआ नया फरीदाबाद शहर

Faridabad Updated Wed, 17 Oct 2012 12:00 PM IST
फरीदाबाद। नया फरीदाबाद (एनआईटी) बुधवार को 63 साल का हो जाएगा। इसे बसाने वाले बोलेंगे हैप्पी बर्थ-डे फरीदाबाद! शहर का 63वां जन्मदिन 17 तारीख को फ्रंटियर पंजाबी युवा मंच द्वारा एनएच-दो स्थित लखानी धर्मशाला में मनाया जाएगा।
इस मौके पर उन लोगों के परिवार को सम्मानित किया जाएगा जिनका विभाजन की त्रासदी झेलकर पाकिस्तान से आए हिंदुओं को यहां बसाने में योगदान रहा है। शहर बसाने वालों में से एक सरदार गुरुवचन सिंह इस शहर को फलते-फूलते देख रहे हैं। जबकि, स्वर्ग सिधार चुके गोविंद दास खामोश सरहदी, कन्हैयालाल खट्टक, श्रीचंद खत्री एवं सुखराम सालार के परिवारों को सम्मान दिया जाएगा। यह जानकारी मंच के प्रधान राजेश भाटिया ने दी है। सम्मान के लिए जो मोमेंटो तैयार किया गया है उसमें इस शहर को बसाने वाले प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद, प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू एवं सरहदी गांधी बादशाह खान की फोटो लगाई गई है।

ये है नए फरीदाबाद का इतिहास
फरीदाबाद। वर्ष 1949 में 17 अक्तूबर को पहला फावड़ा भगत सिंह चौक पर (एनएच-पांच) चलाकर शहर को बसाने का काम शुरू किया गया था। भारत-पाक विभाजन की त्रासदी झेलकर आए लोगाें के लिए देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने दिल्ली के सटे फरीदाबाद में आंदोलन के बाद जमीन दी। इसमें पेशावर, हजारा, मर्दाना, कोहाट, बन्नू एवं डेरा इस्माइल खान आदि फ्रंटियर इलाके से करीब 50 हजार शरणार्थियोें ने आकर फरीदाबाद में बसना शुरू किया। गांधीवादी नेता, स्वतंत्रता सेनानी एवं योजना आयोग के पूर्व सदस्य एलसी जैन ने नए फरीदाबाद शहर की कहानी बयां करने को एक पुस्तक लिखी है। फ्रंटियर से आए लोगों की जिजीविषा एवं उनके जज्बे के कारण उन्होंने इसे ‘द सिटी ऑफ होप’ का नाम दिया।
इन शरणार्थियों को दिल्ली के आसपास क्षेत्र में छत के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। सरकार इन्हें राजस्थान के अलवर और भरतपुर में बसाना चाहती थी। लेकिन उनका कहना था कि वहां उनका विकास नहीं हो सकता। शरणार्थियों ने सरकार के इस फैसले के विरोध में गिरफ्तारियां देनी शुरू कर दीं। नारे लगाए गए कि ‘नहीं जाना सरकार अलवर नहीं जाना’। इस लड़ाई के बाद नेहरू सरकार ने फरीदाबाद न्यू टाउनशिप की योजना बनानी शुरू की। शरणार्थियों के लिए मकान बनाने का काम शुरू हुआ। सरकार ने लोगों को मकान बनाने में सहयोग देने पर एक रुपया रोज मजदूरी देने का वादा किया और लोगों द्वारा मिलजुलकर यह काम शुरू कर दिया।

जेएनयू के शोध में होगी शून्य से शिखर की कहानी
फरीदाबाद। करीब 50 हजार विस्थापितों की इस बस्ती का एक बड़े औद्योगिक शहर के उभरने यानी शून्य से शिखर तक पहुंचने की अनुपम दास्तान जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) को भी भा गई है। इसलिए यह नामचीन शिक्षा केंद्र इस शहर पर पीएचडी करवा रहा है। इसमें फरीदाबाद से जुड़ी छोटी से बड़ी सभी जानकारियां जुटाई जा रही हैं। जेएनयू के सेंटर फॉर हिस्टोरिकल स्टडीज की प्रोफेसर नायर ने मेरठ की रहने वाली रचना मेहरा को इस विषय पर शोध की जिम्मेदारी दी है। यह काम 2009 के अंत से चल रहा है। शोध का काम अंतिम दौर में है। इसमें यह भी बताया जाएगा कि विभाजन के दौरान लोग भले ही खाली हाथ आए हों लेकिन वे पैसा बनाना जानते थे। इसलिए इस शहर ने इतनी ऊंचाई और शोहरत पाई।

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