तीन माह में हटाने होंगे अवैध निर्माण

Faridabad Updated Sat, 22 Sep 2012 12:00 PM IST
फरीदाबाद। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नगर निगम को निर्देश दिया है कि वह तीन माह में शहर से अतिक्रमणों को पूरी तरह से हटाए और कोर्ट में इस बारे में रिपोर्ट पेश करे। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि जब तक शहर से अतिक्रमण पूरी तरह से नहीं हटाए जाएंगे तब तक सीएलयू के मुद्दे पर लगाया गया स्टे न तो हटेगा न ही कोर्ट में चर्चा होगी। इस मामले पर अगली सुनवाई 21 दिसंबर को होगी।
उल्लेखनीय है कि हरियाणा सरकार ने नगर निगम क्षेत्र के 44 मार्गों को व्यावसायिक घोषित करते हुए इन मार्गों पर कार्यरत संस्थानों को सीएलयू करा कर अधिकृत रूप से व्यावसायिक गतिविधि चलाने का अधिकार दिया था। नगर निगम ने जमीन का सीएलयू कर व्यावसायिक प्रयोग की स्वीकृति देना शुरू भी कर दिया था। लेकिन आरटीआई कार्यकर्ता कृष्ण लाल गेरा ने सरकार की इस कार्रवाई के विरोध में पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर दी, जिसमें यह आरोप लगाया गया कि जहां पर निगम सीएलयू कर भवनों के व्यवसायिक प्रयोग की इजाजत दे रहा है वहां पर पार्किंग की व्यवस्था नहीं है। साथ ही इन मार्गों पर लोगों ने अवैध निर्माण व अतिक्रमण कर रखा है। गेरा ने 2008 में शहर के अन्य मार्गों को लेकर भी इसी तरह की एक याचिका पहले भी लगाई हुई थी। कोर्ट इन सभी याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई कर रही है।
शुक्रवार को कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जसवीर सिंह की अदालत में सुनवाई के दौरान नगर निगम आयुक्त डी सुरेश से पूछा गया कि इस संदर्भ में निगम ने क्या कार्रवाई की है। निगमायुक्त ने न्यायालय को बताया कि निगम ने पिछले एक साल में तीन हजार से ज्यादा नोटिस लोगों को दिए हैं तथा डेढ हजार से ज्यादा स्थायी व अस्थायी कब्जों को भी हटाया है। यह प्रक्रिया लगातार जारी है। निगमायुक्त के इस तर्क पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि आज भी शहर अवैध कब्जों से भरा पड़ा है, लोगों को फुटपाथ पर चलने के लिए जगह नहीं है।
सीएलयू पर स्टे हटाने की बात पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि जब तक नगर निगम अवैध कब्जों को नहीं हटा देता तब तक किसी भी सूरत में सीएलयू की इजाजत नहीं दी जा सकती।
याचिकाकर्ता के वकील आरएस चहल ने बताया कि न्यायालय ने निगमायुक्त से आदेश का पालन नहीं होने पर नाराजगी जताई और कहा कि अवैध निर्माण हटाने के लिए अदालत को आदेश करने की आवश्यकता ही नहीं थी, क्योंकि यह अधिकार तो निगमायुक्त के पास होते ही हैं। निगमायुक्त को खुद ही अवैध निर्माण हटा देने चाहिए थे।

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