वर्ल्ड राइट टू नो और वर्ल्ड रेबीज़ डे पर विशेष

Ambala Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
अंबाला। वर्ल्ड राइट टू नो यानी जानने का अधिकार भारत में आरटीआई के नाम से जाना जाता है। राइट टू इनफार्मेशन(आरटीआई) सरकारी कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए किया गया है। इस हथियार की मदद से आम जनता के सामने जिले में हुए कई घपले उजागर हुए हैं।
गेस्ट टीचरों की नियुक्ति : गेस्ट टीचर की नियुक्ति को लेकर एक संगठन ने आरटीआई का सहारा लिया और इसमें हो रहे घपले को उजागर किया। इसका असर यह हुआ है कि आरटीआई के बाद चार लोगों को सस्पेंड तक कर दिया गया।
पेंशन हड़पने का मामला: आरटीआई के सहारे छावनी में बीडी फ्लोर मिल के पीछे एक पेंशन के फर्जी मामले को सामने लाया गया। इसमें कथित रूप से एक महिला का फर्जी अंगूठा लगाकर पेंशन हड़पने के आरोप लगे। इसमें कार्रवाई जारी है।
वहीं कुछ अधिकारियों ने आरटीआई को मजाक भी बना डाला। अंबाला में मनरेगा में हुए घपले को लेकर आरटीआई मांगी गई। इसे अधिकारियों ने इसे इस तरह से लटकाया गया कि हारकर व्यक्ति ने अपने कदम खुद ही पीछे खींच लिए। इसी तरह अंबाला छावनी में एक संपत्ति को लेकर आरटीआई मांगी गई, जिस पर आज तक यह नहीं दी गई। इसी तरह महेश नगर के एक व्यक्ति ने पुलिस विभाग से मोटर व्हीकल एक्ट के मामले में एक सवाल का जवाब मांगा, लेकिन करीब नौ माह बाद भी उसे आज तक जवाब नहीं मिला। हालांकि इसकी अपील भी लग चुकी है।



- सीएचसी और पीएचसी में नहीं मिलती वैक्सीन
- एंटी रैबीज़ वैक्सीन लोगों को खुद खरीदनी पड़ती हैं

अमर उजाला ब्यूरो
अंबाला। जानवराें के काटने से होने वाली रैबीज से बचाने के लिए स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह से तैयार नहीं है। सिविल अस्पताल ही नहीं बल्कि सीएचसी और पीएचसी स्तर पर भी एंटी रैबीज़ वैक्सीन नहीं मिलती। ऐसे में पीड़ित लोगों को इसके लिए बाजार से यह वैक्सीन खरीदनी पड़ती है।
रैबीज जानवरों के काटने से फैलती है और इसके लिए जरूरी है कि पूरी तरह से एतिहात बरती जाए। जिले में आवारा कुत्ते और अन्य जानवर लोगों के लिए सबसे बड़े खतरे बने हुए हैं। ऐसे में यदि यह जानवर किसी को काट लें तो रैबीज़ होने का खतरा बना रहता है। लोगों को बाजार से इसे महंगे दामाें पर खरीदना पड़ता है। सिविल सर्जन डा. मनोज गुप्ता के अनुसार कई बार सप्लाई में शार्टेज के कारण यह समस्या आती है। यदि कहीं शार्टेज है, तो इसे चेक करवाकर दूर करवाएंगे।

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