पास तो बन जाता है, पर नहीं मिलती बस

Ambala Updated Thu, 20 Sep 2012 12:00 PM IST
अंबाला। पास धारकों के लिए बस में चढ़ना किसी जंग से कम नहीं रहा। हालात यह हैं कि चालक भी अब बसें स्टैंड के काउंटर पर लगाने की बजाए एग्जिट पर ही खड़ी कर देते हैं। विद्यार्थियों को भी भागकर इन बसों में चढ़ना पड़ता है। यही नहीं सीट के लिए इतनी मारामारी है कि खिड़कियों से विद्यार्थी बसों में चढ़ते हैं। ऐसा नजारा हमेशा देखने को मिलता है, जब विद्यार्थी बस में चढ़ने के लिए मशक्कत करते हैं।
पासधारक विद्यार्थियों को बसों में चढ़ने के लिए खासी मशक्कत करनी पड़ती है। छावनी बस स्टैंड पर कालेज और स्कूलों की छुट्टी के समय कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिलता है। इस दौरान छावनी बस स्टैंड पर पासधारक विद्यार्थियों का जमावड़ा लगा रहता है। चालक और विद्यार्थियों में चूहे बिल्ली का खेल चलता है। कई बार छात्रों से बचने के लिए चालक अपनी बसों को काउंटर तक नहीं ले जाते और एग्जिट प्वाइंट पर ही खड़ी कर देते हैं। जैसे ही छात्रों को पता चलता है कि बस बाहर खड़ी है, तो वे वहीं पर भागते हैं। बस में चढ़ने की इतनी मारामारी रहती है कि छात्र खिड़कियों से बस में पहले घुसकर सीट हथियाते हैं।

इनसेट
सात हजार पास बना चुका है रोडवेज
अंबाला। जिले में विद्यार्थियों के करीब सात हजार बस पास बन चुके हैं। इन सभी पास धारक विद्यार्थियों को रोडवेज की बसें ही उनके कालेजों और स्कूलों तक लाती हैं। रोडवेज के बेड़े में 212 बसें हैं, जबकि इनमें से आठ बसें स्कूलों में नियमित तौर पर सेवाएं दे रही हैं। ऐसे में ग्रामीण अंचल के कालेजों से आने वाले विद्यार्थियों को मशक्कत करनी पड़ती है। इन क्षेत्रों से आने और जाने वाली बसें बीच रास्ते में नहीं रोकते और इसी कारण से कई बार विद्यार्थी रास्ता जाम तक कर चुके हैं।

इनसेट
छात्राओं के लिए विकट स्थिति
अंबाला। बस में पहले चढ़ने के मुकाबले मेें छात्राओं के लिए स्थिति विकट है। छात्र तो किसी तरह से बस में चढ़ जाते हैं, लेकिन छात्राओं के लिए स्थिति विकट है। छात्राओं को बस का इंतजार करना होता कि कब बारी आए और वे बस में चढ़ें, लेकिन बस में भी उनको परेशानी झेलनी पड़ती है क्योंकि उनको बैठने की जगह तक नहीं मिलती।

इनसेट
बस के दरवाजे पर लटकना पड़ता है
अंबाला। हालात यह हैं कि खिड़कियों के रास्ते बस में चढ़ने के बावजूद कई विद्यार्थियों को बस में घुसने का मौका ही नहीं मिलता। वे बस के दरवाजे पर लटककर यात्रा करते हैं। कई तो सिर्फ बस के पायदान पर पैर लटकाते हैं और खिड़की की ग्रिल पकड़कर ही खुद को संभालते हैं।

कोट
‘बसों को काउंटर पर आना चाहिए ताकि विद्यार्थियों को दिक्कत न हो। इस बारे में मुझे जानकारी नहीं है कि बाहर ही बसों को रोक लिया जाता है। पास ज्यादा हैं, जबकि उतनी बसें उपलब्ध हैं, उसी आधार पर बसों को चलाया जा रहा है। फिर भी चेक करवाकर बसों को काउंटर तक लाया जाएगा।’
- एमएल तंवर, एसएस कैंट बस स्टैंड

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