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आजादी महोत्सव: छोटे गांधी के रूप में प्रसिद्ध थे पंडित रामबली मिश्र, तिरंगा फहराने के लिए छोड़ी थी नौकरी

अजय कुमार जायसवाल, राजगढ़। Published by: vivek shukla Updated Mon, 15 Aug 2022 03:11 PM IST
सार

साइमन कमीशन जलियावाला बाग हत्याकांड तथा महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन के परिणाम स्वरूप मिश्र ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और सत्याग्रही बन गए। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया।

पंडित रामबली मिश्र
पंडित रामबली मिश्र - फोटो : अमर उजाला।
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विस्तार

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान गोरखपुर के दक्षिणांचल में स्थित वर्तमान गोला तहसील क्षेत्र का खोपापार गांव छोटा साबरमती के नाम से प्रसिद्ध था। पंडित रामबली मिश्र को छोटे गांधी के रूप में ख्याति थी। इस वजह से यह गांव पूर्वांचल का राष्ट्रीय चेतना का केंद्र बिंदु बन गया था। भारत मां को स्वतंत्र कराने निकले वीर सपूत इस गांव में आश्रय पाते थे। आज इस गांव में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे आजादी के परवानों की सही जानकारी मिल सके।



छोटे गांधी के रूप में प्रसिद्ध ब्रिटिश हुकूमत को हिला देने वाले पंडित रामबली मिश्र का जन्म उरुवा ब्लॉक के माल्हनपार के नजदीक भरवलिया गांव में हुआ था। बचपन में पिता के निधन के बाद इनको मां अपने मायके खोपापार आकर पिता के साथ रहने लगीं थीं। अपने को पिसहारिन का पुत्र कहने वाले मिश्र ने प्रारंभिक शिक्षा बनवारपार देईडीहा स्कूल तथा मिडिल की शिक्षा गोला से प्राप्त की। सन 1920 में जिला परिषदीय विद्यालय बारानगर में अध्यापक नियुक्त हुए, लेकिन नौकरी में मन नहीं लगा। उस समय के राजनीतिक हालात के कारण उनके मन में राष्ट्रप्रेम की तरंगे तरंगित होने लगी।


तिरंगा फहराने के कारण छोड़नी पड़ी नौकरी
साइमन कमीशन जलियावाला बाग हत्याकांड तथा महात्मा गांधी द्वारा चलाए जा रहे असहयोग आंदोलन के परिणाम स्वरूप मिश्र ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और सत्याग्रही बन गए। इसके बाद अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया। जेल में ही थे तभी उनकी माता का देहावसान हो गया। इन दिनों में वह राजीव नाम से राष्ट्र प्रेम संबंधी कविताएं लिखते थे। सन 1921 में पंडित रामबली में गुरुकुल कांगड़ी हरिद्वार में बतौर अध्यापक नियुक्त हुए और विद्यालय का वार्डन बन गए। उस समय उन्होंने छात्रावास परिसर में तिरंगा फहराया। अंग्रेजी सरकार के आदेश पर प्रधानाचार्य ने इनको तिरंगा झंडा हटाने को कहा। इस पर मिश्र ने अपने पद से त्याग पत्र दे दिया।

 

नौकरी को छोड़कर हिंदी के प्रचार-प्रसार में जुट गए

नौकरी छोड़ने बाद रामबली मिश्र अपने गांव खोपापार आकर  हिंदी भाषा का प्रचार-प्रसार करने लगे। स्वतंत्रता आंदोलन के प्रशिक्षण केंद्र के रूप में कई विद्यालय खोले। सन 1930 में हिंदी साहित्य विद्यालय खोपापार और 1940 में अखिल भारतीय चरखा संघ की स्थापना की। सभी विद्यालय आवासीय थे। विद्यालय का खर्चा क्षेत्र के लोगों के सहयोग से चलता था। इन विद्यालयों में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, गुजरात आदि प्रांत के छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। इसकी सराहना महात्मा गांधी ने 1936 में अपनी हरिजन पत्रिका में की थी। उन्होंने इसे पूर्वांचल राष्ट्रीय चेतना केंद्र के रूप में उल्लेख किया था।

अंग्रेजों ने जलवा दिया घर, डाल दिया जेल में
1942 में अंग्रेजों ने पंडित रामबली मिश्र का घर जलवा दिया। साथ ही चरखा केंद्र को भी जला दिया गया। पंडित रामबली मिश्र व उनकी पत्नी कैलाशी देवी को गोरखपुर जेल में बंद कर दिया गया। जेल में इनकी मुलाकात बलिया जिले के रामपुर कानूनगो गांव के निवासी चंद्रिका प्रसाद वकील व उनकी पत्नी से हुई। जेल में ही चन्द्रिका प्रसाद के पत्नी का निधन हो गया। उनके दो पुत्र थे। बड़े पुत्र को पंडित रामबली मिश्र ने गोद ले लिया।

धुरियापार से विधायक चुनी गई थी  
जेल से छूटने के बाद 1952 में कैलाश कैलाशी देवी धुरियापार विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़कर विधायिका बनी। दोनों स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी आज नहीं है। उपेक्षित उनका गांव आज भी अपने छोटी गांधी की कहानी को बड़ी तवायता के साथ कहता है। लोगों को उम्मीद है कि किसी न किसी दनि शासन-प्रशासन का ध्यान इस गांव पर जाएगा और इसका विकास होगा।
 
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