'एक हसीना थी एक दीवाना था' का प्लान है तो जान लें कैसी है मूवी

amarujala.com- Presented by :भावना शर्मा Updated Sun, 02 Jul 2017 12:30 PM IST
एक हसीना थी एक दीवाना था
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उपेन पटेल ने लंबे समय बाद फिल्म 'एक हसीना थी एक दीवाना था' से सिल्वर स्क्रीन पर वापसी की है। उपेन के साथ नताशा फर्नांडिस लीड रोल में हैं। सुनील दर्शन ने बेटे शिव को लेकर फिल्म बनाई है। क्रिटिक्स ने फिल्म को अच्छे रिव्यू नहीं दिए हैं। ये एक हॉरर मूवी है। जानें वो 8 बातें जिनकी वजह से आप ये फिल्म देखना पसंद नहीं करेंगे।
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1. यह एक चुटकुला है। अगर आपने लंबे समय से ऐसी फिल्म न देखी हो, जिसमें बेसिर-पैर की बातें और दिमागी दिवालियेपन के साक्षात दर्शन होते हैं तो निर्देशक सुनील दर्शन की एक हसीना थी एक दीवाना था देखिए। आप निराश नहीं होंगे। अजीब ढंग से फिल्म भूत-प्रेत- आत्मा टाइप की बातों से शुरू होती है।


2. हीरोइन को भी लगता है कि यूरोप की एक खूबसूरत लोकेशन के भव्य मेंशन में वह पहली बार नहीं आई। पुराना कनेक्शन जरूर है। इस बीच कहानी में चर्चा होती  है कि क्या भूत सचमुच होते हैं? पता लगता है कि नहीं होते! फिर क्या चक्कर है...? हीरो को किसी ने आत्मा होने का ड्रामा करने और हीरोइन को आत्महत्या के लिए मजबूर करा देने के वास्ते पैसे दिए हैं।

3. कौन है जिसे हीरोइन की मौत से फायदा होगा और क्यों? हॉरर के रास्ते फिल्म रोमांस की तरफ बढ़ती है, जिसमें हीरो सौ परसेंट दुखी आत्मा है। उसके चेहरे पर कभी मुस्कान नहीं आतीऔर अंतः मैं क्लाइमेक्स ऐसे खुलता है, जैसे ढाक के तीन पात। इन दिनों टीवी के डेली सोप में भी इससे अच्छी राइटिंग होती है।

4. सुनील दर्शन ने बेटे शिव को लेकर फिल्म बनाई है और अच्छी कहानी तक नहीं चुन सके। करिअर की दूसरी फिल्म में भी शिव कतई प्रभावित नहीं करते। पुरानी गलतियां उन्होंने दोहराई। उनकी डायलॉग डिलेवरी अनाकर्षक है। वह न अभिनय से और न पर्दे पर मौजूदगी से असर डालते हैं। उन्हें कोई और राह चुन लेनी चाहिए।

5. नताशा फर्नांडिस नया चेहरा हैं और उनमें हीरोइन वाली बात नजर आती है। मगर जरूरी है कि भविष्य में वह अच्छी कहानियों का हिस्सा बनें। उन्होंने ठीकठाक ऐक्टिंग की। मॉडल से ऐक्टर बने उपेन पटेल ने अर्से बाद कमबैक किया है। उनका काम किरदार के अनुरूप है। उन्होंने हिंदी उच्चारण में सुधार किया
है।

6. आप चौंकते हैं कि विशाल मेंशन और भव्य लोकेशनों में ज्यादातर सिर्फ तीन ही किरदार बोलते-बतियाते हैं। बाकी खामोश हैं। एक खराब फिल्म का क्राफ्ट कैसा होता है, एक हसीना थी एक दीवाना था उसका बढ़िया नमूना है।

7. फिल्म का एकमात्र प्लस पॉइंस संगीत है। जिसे नदीम ने रचा है। इसमें 1990 के दशक वाला टच है। सुनील दर्शन ने गानों को बेहद खूबसूरती से शूट किया है लेकिन फिल्म को बुनने में उन्होंने उतना ही कच्चापन दिखाया। 

8. आखिर में आप पाते हैं कि इंटरवेल में विलेन की गोली खाने वाला हीरो, हीरोइन को बचाने के लिए भगवान से चौदह दिन मांग कर लाया था! जिस दिन विलेन ठिकाने लगा, वह धरती पर हीरो का आखिरी दिन है। आप सोचते रह जाते हैं कि निर्देशक-कहानीकार कौन से जमाने में रह रहे हैं!! ये किस जमाने की फिल्म है!!





 

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