इंटरव्यू: नवाजुद्दीन बोले- पार्टियों में इसलिए नहीं जाता, मेरे अंदर कुछ कमियां है

पुनीत सिंह, अमर उजाला, मुंबई Updated Sat, 07 Jul 2018 10:32 AM IST
Nawazuddin
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अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी जल्द ही बाल ठाकरे के जीवन पर आधारित फिल्म ‘ठाकरे’ व लेखक सआदत हसन मंटो पर बनी फिल्म ‘मंटो’ में टाइटल रोल में नजर आने वाले हैं। फिल्मों और निजी जिंदगी के बारे में नवाजुद्दीन ने अमर उजाला से बातचीत की...
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किरदार और शख्सियत आप दोनों तरह के रोल निभाने में माहिर हैं, दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं?
जैसा कि आपने बताया किरदार निभाना और शख्सियत निभाना बहुत अलग चीज है। किरदार में आप शूटिंग करते वक्त तमाम सुधार कर सकते हैं, अपनी कल्पना का इस्तेमाल कर सकते हैं। मगर शख्सियत निभाते वक्त आपके पास यह आजादी नहीं होती है, क्योंकि पूरी दुनिया उस शख्स को जानती है। सबको उसके हाव-भाव पता होते हैं, लिहाजा शख्सियत निभाने में बंदिशें होती हैं।


बात शख्सियत की हो रही है और आप अपनी अगली फिल्म 'ठाकरे' में बाल ठाकरे का रोल निभा रहे हैं?
'ठाकरे' फिल्म मुझे शिवसेना के सांसद संजय राउत जी ने ऑफर की। वह मुझे एक होटल में मिले और बोले कि तुम्हें यह रोल करना है। उस वक्त मैने बस हां कहा और बाहर आ गया। बाहर निकलकर मैं जैसे ही गाड़ी में बैठा, तो मैं काफी नर्वस हो गया, क्योंकि बाला साहेब को पर्दे पर जीना बहुत मुश्किल है। मेरे हिसाब से यह मेरा अब तक का सबसे मुश्किल किरदार है।

फिल्म 'ठाकरे' मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में बन रही है। कितना मुश्किल रहा एक ही शॉट, एक ही सीन को दो अलग-अलग भाषाओं में करना?
जी हां, फिल्म को हम मराठी और हिंदी दोनों भाषाओं में रिलीज कर रहे हैं। शूटिंग के वक्त तो उतनी दिक्कत नहीं हुई, मगर तैयारी के वक्त बहुत परेशानी हुई थी। उस वक्त मैं नर्वस हो गया था, क्योंकि मुझे मराठी ठीक से नहीं आती थी, इसलिए मैंने एक ट्यूटर रखा। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के एक साथी हैं, उनकी मदद से मैंने मराठी सीखी। एक महीने तक मैंने दिन-रात मराठी सीखने के लिए मेहनत की।

 

आप बाल ठाकरे से पहले कभी नहीं मिले, तो आपने इस रोल को निभाने के लिए किस तरह से तैयारी की?
यह मेरी जिंदगी का सबसे मुश्किल रोल है। मैंने बाला साहेब के कई वीडियोज देखे, उनके करीबियों से मिला। उद्धव ठाकरे से मिला व उनसे बहुत कुछ जाना। बाकी हर छोटी-बड़ी चीज पर काम किया, जैसे- उनके उठने-बैठने, बोलने के तरीके से लेकर, सिगार पकड़ने के तरीके तक सब पर काम किया, ताकि मैं उनके किरदार पर पकड़ मजबूत कर सकूं। 

फिल्म जब उत्तर भारत में रिलीज होगी, तो क्या आपको लगता है कि बाल ठाकरे के बारे में हिंदी भाषी राज्यों में सोच बदलेगी ? 
देखिए, बाला साहेब ठाकरे को पूरा देश जानता है। हर कोई उनसे वाकिफ है। उनकी शख्सियत को आप नजरअंदाज नहीं कर सकते। बाकी अगर आप देखें, तो पहले वह एक कार्टूनिस्ट थे, फिर उन्होंने महाराष्ट्र में लोगों की बुरी हालत देखी और बीड़ा उठाया सब कुछ सही करने का और इसी मकसद से राजनीति में आए। मैं तो यह कहूंगा अगर बाला साहेब जैसा हर नेता हो जाए, तो देश बहुत तेजी से तरक्की करेगा। 

आप सआदत हसन मंटो पर भी बायोपिक कर रहे हैं। अमूमन बाकी अभिनेता इस तरह के किरदार करने से घबराते हैं?
कमर्शियल फिल्में करना आसान है, ज्यादातर हिट भी हो जाती हैं। मगर मुझे लगता है कि आपको एक ही जिंदगी मिलती है और इसी जिंदगी में अगर मैं अपने मुताबिक काम कर लूं, तो मेरे लिए उससे ज्यादा खुशी की बात कुछ और नहीं होगी। बाकी मंटो की बात करें, तो वह एक अलग शख्सियत हैं। एक अलग विलक्षण प्रतिभा थी उनके लेखन में। मतलब जो उन्होंने लिखा, उसे भुलाए नहीं भूल सकते। 

फिल्मों में छाए रहने वाले नवाज फिल्मों की पार्टियों या फंक्शन से क्यों नदारद रहते हैं?
मैं शुरू से ही ऐसा हूं। लोगों के बीच मुझे घबराहट महसूस होने लगती है कि कहीं लोगों को मेरी औकात न पता चल जाए। मुझे कहीं न कहीं लगता है कि मैं इन सब चीजों से खुद को जोड़ नहीं पा रहा हूं। बाकी पार्टियों में जाने का मेरा मन नहीं करता, क्योंकि मेरे अंदर कुछ कमियां हैं। अगर गलती से चला भी जाता हूं, तो जल्दी निकल आता हूं।
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