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मंजिलें और भी हैं: जो लोग मजाक उड़ाते थे, अब मिसाल देते हैं, आसान नहीं थी 'एनी दिव्या' की उड़ान

एनी दिव्या Updated Thu, 22 Aug 2019 01:09 AM IST
Ani Divya
Ani Divya - फोटो : अमर उजाला
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पायलट बनने का सपना मैंने बचपन से ही देखा था, लेकिन घर की आर्थिक स्थिति देखते हुए हमेशा लगता था कि यह उड़ान इतनी आसान नहीं होगी। मेरा जन्म पंजाब के पठानकोट में हुआ। मेरे पिता सेना में सिपाही थे। जब मैं दस वर्ष की थी, तब पापा की पोस्टिंग आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में हो गई। हम विजयवाड़ा आ गए। मेरी पढ़ाई-लिखाई विजयवाड़ा के केंद्रीय स्कूल से ही हुई। जहां अंग्रेजी और हिंदी, दोनों में पढ़ना-लिखना सिखाया जाता था। 
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हालांकि, वहां अंग्रेजी का इस्तेमाल कम ही किया जाता था। स्कूल के दिनों में जब मैं पायलट बनने की बात अपने दोस्तों के बीच करती थी, तो सब मेरा मजाक उड़ाते थे। नौवीं कक्षा के दौरान एक टीचर ने पूरी कक्षा को 10 वे चीजें लिखने के लिए कही, जिनको पाने के लिए हमें लक्ष्य बनाकर तैयारी करनी थी। 

इस असाइनमेंट ने मुझे प्रभावित किया। मेरी पहली पसंद पायलट बनना थी। खैर, 12वीं पास करने के बाद जहां मेरे सभी दोस्तों ने मेडिकल, इंजीनियरिंग की कोचिंग शुरू की, वहीं मैंने उत्तर प्रदेश के फ्लाइंग स्कूल, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय उड़ान अकादमी में प्रवेश पाने के लिए मेहनत शुरू कर दी। हालांकि यह बेहद कठिनाई भरा सफर रहा।

अकादमी की फीस तब करीब पंद्रह लाख रुपये थी, जिसे दे पाना मेरे पिता के लिए नामुमकिन था। लेकिन उन्होंने मेरे सपने के बीच इस समस्या को नहीं आने दिया। लिहाजा उन्होंने कुछ पैसे अपने दोस्तों से उधार लिए और बाकी फीस शिक्षा ऋण के माध्यम से अदा करने का फैसला किया। हालांकि बाद में मुझे स्कॉलरशिप भी मिली, जिसने राह आसान बना दी।

मैंने अकादमी में प्रवेश ले लिया, पर समस्याओं ने यहां भी मेरा पीछा नहीं छोड़ा। मैं स्कूल के दिनों से ही अंग्रेजी पढ़-लिख लेती थी। मगर अंग्रेजी में बोल पाना किसी चुनौती से कम न था। मुझे अंग्रेजी में बोलने और उस माहौल में खुद को ढालने में वक्त लगा।

मेरी खराब अंग्रेजी का लोग मजाक उड़ाया करते थे और यह बात मुझे बहुत परेशान करती थी। कई बार तो ऐसा हुआ कि मैंने अकादमी छोड़ने और घर जाने का मन बना लिया, लेकिन पिता के भरोसे और पायलट बनने के सपने ने ऐसा करने न दिया। पहले सभी लोग मुझ पर हंसते थे, मेरा मजाक बनाते थे। लेकिन कुछ समय बाद वही लोग मेरी गलतियों को भी सुधारने लगे। 
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