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मंजिलें और भी हैं: बंजर जमीन ने ओढ़ ली है हरियाली की चादर

मोइरांगथेम लोइया Updated Thu, 12 Sep 2019 06:43 AM IST
मोइरांगथेम लोइया
मोइरांगथेम लोइया - फोटो : अमर उजाला
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तकरीबन 17 वर्ष पहले मैंने इस बंजर जमीन को हरा-भरा बनाने का काम शुरू किया था, जिसका उद्देश्य पर्यावरण को जीवित रखने में अपना सहयोग देना था। अब यही जंगल अनेक किस्म के वन्य प्राणियों का बसेरा बन चुका है। 
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मैं मणिपुर के पश्चिमी इंफाल का रहने वाला हूं। मैं बचपन में कई बार लेंगोल पहाड़ी के पुनशिलोक वनक्षेत्र में घूमने आया हूं। पढ़ाई के दौरान अक्सर अपने कई दोस्तों के साथ मैं यहां आता था। यहां की हरियाली हमें बेहद पसंद थी। बाद में उच्च शिक्षा के लिए मुझे यहां से बाहर जाना पड़ा। पढ़ाई के बाद मेरी नौकरी भी लग गई, जिसकी वजह से जंगल की ओर आना-जाना कम हो गया था। 

नौकरी के दौरान ही एक बार मैं यहां आया, तो जंगल के हालात देखकर दंग रह गया। कभी हरा-भरा रहने वाला यह जंगल पूरी तरह बंजर हो चुका था। दरअसल स्थानीय लोगों ने धान की खेती के लिए भूमि को सुरक्षित रखने के लिए पेड़ों को जला दिया था। साथ ही अंधाधुध तरीके से पेड़ काट दिए जाने की वजह से पूरा का पूरा इलाका वीरान हो चुका था। 

चूंकि बचपन से ही मैं पेड़-पौधों के प्रति थोड़ा भावुक था, ऐसे में यह देखकर मैं व्यथित हो उठा। मेरे मन में इसे फिर से हरा-भरा करने का विचार उत्पन्न हुआ। इसे नए सिरे से हरियाली की चादर में लपेटना मेरे लिए चुनौतीपूर्ण था। इस काम को पूरा करने के लिए मैंने नौकरी छोड़ने का विचार किया। क्योंकि पौधों को लगाने के साथ, उनके संरक्षण की भी जरूरत थी, जो नौकरी के साथ शायद पूरी न होती। 

मुझे पता था कि इतनी बड़ी चुनौती को पूरा करने के लिए निरंतर काम करना पड़ेगा। काफी सोच-विचार के बाद मैंने नौकरी छोड़ दी। पुनशिलोक के पास ही एक छोटी-सी झोपड़ी बनाई और वहीं रहना शुरू कर दिया। इसके बाद अगले छह वर्ष तक इसी में रहते हुए मैंने ओक, बांस, टीक आदि के बीज खरीद कर उनकी नर्सरी लगाई। नर्सरी में जब पौधे रोपने लायक तैयार हुए, तो उनकी रोपाई करने लगा। 

साथ ही अन्य जंगली पेड़ों के साथ साथ फलदार पेड़ भी लगाने लगा। जब वहां थोड़ी-बहुत हरियाली आई, तो स्थानीय लोग भी इस प्रयास में सहयोग करने लगे। इस काम में मैंने अपने कुछ दोस्तों को भी जोड़ा और वाइल्डलाइफ ऐंड हैबिटैट प्रोटेक्शन सोसायटी (डब्ल्यूएएचपीएस) बनाई। इसके बाद वन विभाग ने भी हमारा सहयोग किया। उन्होंने जंगल के आसपास बनाए गए अवैध मकानों को ढहा दिया, जिससे जंगल की जमीन वापस मिल गई। 

तकरीबन तीन सौ एकड़ में फैला पुनशिलोक जंगल अब देश-विदेशों के पर्यटकों से भी गुलजार रहने लगा है। इस जंगल में करीब ढाई सौ से अधिक प्रजाति के पेड़-पौधे तथा पच्चीस से भी ज्यादा बांस की प्रजातियां हैं। अब तो यह जंगल खुद से विकसित होने लगा है। साथ ही इसमें हिरण, भालू समेत दर्जनों तरह के वन्यजीव रहने लगे हैं। 

पूरा जंगल हर समय पक्षियों के कलरव से गूंजता रहता है। पेड़ों की वजह से यहां के तापमान में भी गिरावट आ आई है। हालांकि लोगों के साथ-साथ राज्य सरकार की ओर से मुझे इस काम के लिए आर्थिक सहयोग भी मिला है। 

बावजूद इसके मेरा मानना है कि, तेजी से बिगड़ते पर्यावरण के बीच मेरे जैसे एकल प्रयास करने वालों को प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है, ताकि जिस तेजी से पेड़ कट रहे हैं, उससे अधिक तेजी से पौधे लगाये जा सकें। तभी पर्यावरण संतुलन की स्थिति बिगड़ने से बची रहेगी। 

(विभिन्न साक्षात्कारों पर आधारित।)
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