रास्ते में मिले सिक्कों ने पुरातत्वविद बना दिया

ओम प्रकाश शर्मा Updated Wed, 07 Mar 2018 04:50 PM IST
Om Prakash Sharma
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अविभाजित पंजाब के सियालकोट से मेरा परिवार राजस्थान के बूंदी शहर आ गया था। तिरसठ साल पहले मेरा जन्म यहीं हुआ। मेरे जन्म से पहले मां-बाप की कई संतानें पैदा होने के कुछ ही दिनों में काल के गाल में समा चुकी थीं। मेरे जन्म के समय भी घरवालों को मुझे खोने का डर था। मां-बाप ने टोटकों का सहारा लिया गया।
उन्हें किसी ने बताया कि अगली संतान के पैदा होने के अगले तीन वर्षों तक उसका लिंग बदलकर प्रचारित करने से उसकी जान बच पाएगी। मां-बाप ने ऐसा ही किया। उस दौर में लड़कों के जन्म पर मिठाई, तो लड़कियों के जन्म पर नमक बांटा जाता था। मेरे जन्म पर नमक बांटा गया। तीन साल लड़कियों की तरह रहने के बाद मैं धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। बढ़ती उम्र के साथ मेरा एक अजीब-सा विश्वास मजबूत होता जा रहा था।

न जाने कहां से यह ख्याल पक्का हो रहा था कि मुझे प्रकृति के बीच ज्यादा से ज्यादा वक्त बिताना है। मेरे दोस्त स्कूल जाते, घर के दूसरे काम करते, मैं पूरे दिन नदी, नाले, पहाड़ियों पर पता नहीं किस चीज की तलाश में घूमता रहता।

बचपन की ही बात है, पहाड़ियों पर घूमते हुए मुझे दो पुराने सिक्के मिले। मैंने उन सिक्कों को अपने पिता जी को दिखाया। पिता जी ने पूछा कि सिक्के कहां से मिले? मेरा जवाब सुनते ही उन्होंने मेरे गाल पर तमाचा जड़ दिया। उनका यह तमाचा सिर्फ इसलिए था कि मैं जहां से सिक्के लेकर आया था, भूत-प्रेतों के डर से उस जगह पर कोई नहीं जाता था। उस दिन के बाद ऐसी जगहों पर जाने की इच्छा और पुरानी धातुओं को ढृंढने की मेरी जिज्ञासा और बढ़ गई।
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